सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 192 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 109

८० वाक्यपदीयम्
महाभाष्य में दोनों मत लिखे हैं। 'एकः शब्दो बह्वोऽक्षाः पादाः माषाः' इत्यादि भाष्य
की पङ्क्तियाँ शब्दों में अभेद व्यवहार कहती हैं और 'तद्यथाः सारूप्यके ससोमके सरवण्डिके
बर्त्तने तस्येदं ग्रहणम्' इत्यादि भाष्य की पङ्क्तियाँ भेद व्यवहार बताती हैं।
किन्तु दोनों पक्षों का तात्पर्य यह है कि जो लोग शब्द को कार्य (अनित्य) मानते हैं।
उनके मत में शब्दों का नानात्व मुख्य है और एकत्व (अभेद) को 'प्रति उच्चारण में शब्द भेद'
होने पर भी 'यह वही शब्द है' इस प्रकार प्रत्यभिज्ञात्मक ज्ञान होने से काल्पनिक मानते हैं।
इसका मूल 'रूपसामान्याद्वा सिद्धम्' यह वार्तिक है और जो शब्दों को नित्य मानते हैं उनके
मत से एकत्व मुख्य है और नानात्व (अर्थ भेद होने के कारण शब्द भेद) काल्पनिक और
आरोपित है ॥ ७० ॥
शब्दनित्यतावादिमीमांसकमतेन शब्दानामेकत्वं वर्णयन्नाह—
मीमांसकों के मत में शब्दनित्य तथा एक है। उनका कहना है। कि—
पदभेदेऽपि वर्णानामेकत्वं न निवर्त्तते ।
वाक्येषु पदमेकं च भिन्नेष्वप्युपलभ्यते ॥ ७१ ॥
पदभेदेऽपि पदानाम्-अर्कः अश्वः अर्थ इत्यादीनां भेदेऽपि वर्णानाम् अकारा-
दीनामेकत्वं न निवर्त्तते 'स एवायमकार' इति प्रतीतेः तदुक्तं भाष्ये 'एकत्वादकारस्य
सिद्धम्' इति । नन्वकारस्यैकत्वे कालशब्दव्यवायः देशपृथक्त्वदर्शनं च न स्यादिति चेन्न
उपलब्धिव्यवधानेन कालशब्दव्यवायस्य सत्तावद्देशपृथक्त्वदर्शनस्य चोपपत्तेः। एवं
भिन्नेष्वपि वाक्येषु एकं पदं चोपलभ्यते 'तदेवेदं पदम्' इत्यनुभूयते इत्यर्थः।
पदभेदेऽपि वर्णैकत्वमिव वाक्यभेदेऽपि पदैकत्वमेवेति भावः ॥ ७१ ॥
पदों (अर्थ, अर्कः, और अश्वः) के अकार के भेद होने पर भी 'स एवायमकारः' इस
प्रतीति के कारण अकार वर्ण वही है (एक ही है) उनकी एकता निवृत्त नहीं हो सकती।
इसी भाँति भिन्न-भिन्न देश और कालमें उच्चारित वाक्यों में पदों के भिन्न होने पर भी पद
एक ही है क्योंकि 'तदेवेदं पदम्' यह अनुभव प्रमाण है। इसे भगवान् भाष्यकार ने भी
'एकत्वादकारस्य सिद्धम्' वार्तिक से स्पष्ट किया है ॥ ७१ ॥
नन्वेवं वर्णातिरिक्तं पदं पदातिरिक्तं च वाक्यं स्यादित्यत आह—
किन्तु इसमें यह नहीं समझना चाहिए कि वर्ण से भिन्न पद और पद से भिन्न वाक्य
है। क्योंकि—
न वर्णव्यतिरेकेण पदमन्यच्च विद्यते ।
वाक्यं वर्णपदाभ्यां च व्यतिरिक्तं न किञ्चन ॥ ७२ ॥
वर्णव्यतिरेकेण वर्णव्यतिरिक्तं पदं च अन्यत् वर्णेभ्योऽन्यत् न विद्यते एवं
वर्णपदाभ्यां व्यतिरिक्तं वाक्यं च किञ्चन न विद्यते वर्णा एव पदं वाक्यं
चेति यावत् ततश्च वर्णानामेकत्वात्तद्रूपाणां पदानां वाक्यानां चैकत्वमुपपन्नम् ॥
वर्णों से अलग पद की कोई सत्ता ही नहीं है और वर्ण तथा पदों से अलग वाक्य भी
कोई वस्तु नहीं है। अर्थात् वर्ण ही पद और वाक्य है। वर्ण भी एक है। अतः पद और वाक्य
भी एक ही सिद्ध है।