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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 759 में से

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पृष्ठ 82

प्रकरणम् ] भावानुवादसहितम् ९
न्यायकन्दली
तस्याः सद्भावे किं प्रमाणम् ? दुःखसन्ततिर्धम्मिणी अत्यन्तमुच्छिद्यते सन्ततित्वादीप-
सन्ततिवदिति तार्किकाः । तद्युक्तम्, पार्थिवपरमाणुरूपादिसन्तानेन व्यभिचारात् । "अशरीरं
वाव सन्तं प्रियाप्रिये न स्पृशतः" इत्यादयो वेदान्ताः प्रमाणमिति तु वयम् । भूतार्थानामेषाम-
प्रामाण्यप्रसङ्ग इति चेन्न, प्रत्यक्षेणानैकान्तिकत्वात् । अथ मतं भूतार्थप्रतिपादकं वचनमनुवादकं
स्यात्, ततश्चाप्रमाणत्वं प्रमाणान्तरसापेक्षत्वात्, प्रमायां साधकतमत्वाभावादिति ।
(प्र.) इसमें क्या प्रमाण है कि दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति होती है ? इस
प्रश्न के उत्तर में तार्किक लोग यह अनुमान उपस्थित करते हैं कि दुःखों की
सन्तति (समूह) का अत्यन्त विनाश होता है, क्योंकि उसमें सन्ततित्व है, जैसे
दीपसन्तति । किन्तु अत्यन्त विनाश के साधन के लिए जिस 'सन्ततित्व' हेतु को
उपस्थित किया गया है, वह पार्थिव परमाणु के रूपादि में व्यभिचरित है¹ । इस-
लिए हम लोग कहते हैं कि "अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः" इत्यादि वेदान्त
ही (दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति में) प्रमाण हैं । (प्र.) भूत अर्थात् निष्पन्न विषय
के अर्थ का प्रतिपादन करनेवाले वेदान्त के ये वाक्य प्रमाण नहीं हैं । (उ.) ऐसा
नहीं कह सकते, क्योंकि उस दशा में प्रत्यक्ष ² प्रमाण में व्यभिचार होगा । अगर
ऐसा कहें कि भूत अर्थ के प्रतिपादक वचन अनुवादक हैं, अतः वेदान्तों में दूसरे
प्रमाणों की अपेक्षा के कारण अप्रामाण्य की सिद्धि होगी । क्योंकि प्रमा का जो
'साधकतम' होगा, वही 'करण' होने से प्रमाण होगा । अनुवादक वाक्य अपने अर्थ के

  1. अभिप्राय यह है कि वैशेषिक पार्थिव परमाणु को नित्य मानते हुए भी उसमें रूप, रस,
    गन्ध और स्पर्श को अनित्य मानते हैं । क्योंकि पाक से उनका परिवर्तन घटादि स्थूल
    वस्तुओं में प्रत्यक्ष सिद्ध है । किन्तु उनके मूल कारण परमाणुओं में रूपादि के परिवर्तित
    हुए बिना घटादि में उनका परिवर्तन सम्भव नहीं है । अतः यह मानना पड़ेगा कि पार्थिव
    परमाणु के रूपादि पाक से परिवर्तित होते हैं । रूपादि का यह परिवर्तन पहले रूपादि का
    नाश और दूसरे रूपादि की उत्पत्ति के सिवाय और कुछ नहीं है । किन्तु परमाणु तो नित्य
    है, उसमें सभी समय कोई न कोई रूपादि अवश्य रहते हैं । तस्मात् एक ही परमाणु में
    नानाजातीय रूपादि की सत्ता माननी पड़ेगी । इस प्रकार पार्थिव परमाणुगत नानाजातीय
    रूपादि का समूह मानना पड़ेगा । किन्तु उस समूह का कभी अत्यन्त विनाश नहीं होता है,
    अतः उसमें कथित 'सन्ततित्व' हेतु है । तस्मात् उक्त 'सन्ततित्व' हेतु व्यभिचार-दुष्ट है ।
  2. प्रत्यक्ष निष्पन्न वस्तु का ही होता है । अतः 'वेदान्ता अप्रमाणम्, भूतार्थविषयकत्वात्' अर्थात्
    वेदान्त अप्रमाण हैं, क्योंकि वे भूतार्थ के प्रतिपादक हैं । इस अनुमान का भूतार्थप्रति-
    पादकत्व हेतु प्रत्यक्ष प्रमाण में है, अथ च उसमें अप्रामाण्यरूप साध्य नहीं है । अतः उक्त
    हेतु व्यभचरित होने के कारण वेदान्तों में अप्रामाण्य का साधक नहीं हो सकता ।