वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 755, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ें७८८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उपसंहार-
न्यायकन्दली
सच्छायः स्थूलफलदो बहुशाखो द्विजाश्रयः ।
तस्यां श्रीधर इत्युच्चैरर्थिकल्पद्रुमोऽभवत् ॥ ७ ॥
असौ विद्याविदन्धानामसूत श्रवणोचिताम् ।
षट्पदार्थहितामेतां रुचिरां न्यायकन्दलीम् ॥ ८ ॥
त्र्यधिकदशोत्तरनवशतशाकाब्दे न्यायकन्दली रचिता ।
श्रीपाण्डुदासयाचितभट्टश्रीश्रीधरेणेयम् ॥ ९ ॥
॥ समाप्तेयं पदार्थप्रवेशन्यायकन्दली टीका ॥
॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः ॥
(७) उन्हीं से 'श्रीधर' उत्पन्न हुए, जो (इन सादृश्यों के कारण) अर्थियों के
लिए कल्पवृक्ष के समान थे; क्योंकि कल्पवृक्ष भी अपनी घनी छाया से अर्थियों के
ताप को दूर करता है । इनसे भी अर्थियों के अनेक विघ्न-ताप दूर होते थे ।
कल्पवृक्ष भी बहुत बड़े फल का दाता है, इनसे भी मोक्षरूप महान् (उपदेशादि के
द्वारा) फल प्राप्त होता था । कल्पवृक्ष की भी अनेक शाखायें हैं । उनके भी
शिष्यप्रशिष्य की अनेक शाखायें थीं । कल्पवृक्ष भी अनेक द्विजों (पक्षियों) का
आश्रय है, ये भी अनेक द्विजातियों के आश्रय थे ।
(८) उन्हीं के द्वारा तत्त्वज्ञान को उत्पन्न करनेवाली और विद्याप्रेमियों के सुनने
योग्य यह अतिरमणीय 'न्यायकन्दली' टीका रची गयी ।
(९) श्रीपाण्डुदास कायस्थ की प्रार्थना (से प्रेरित होकर) भट्ट श्री श्रीधर ने
९१३ शाकाब्द में 'न्यायकन्दली' की रचना की ।
॥ षट् पदार्थों के तत्त्वज्ञान को उत्पन्न करनेवाली न्यायकन्दली टीका
समाप्त हुई ॥