वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 752, कुल 759 में से
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प्रशस्तपादभाष्यम्
दीनामिव प्रत्यशेषु वृत्त्यभावात्, स्वात्मगतसंवेदनाभावाच्च । तस्मादिह
बुद्धयनुमेयः समवाय इति ।
॥ इति प्रशस्तपादभाष्ये समवायपदार्थः समाप्तः ॥
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इसके प्रत्यक्ष न होने का यह हेतु भी है कि (संयोगादि की तरह
अनुयोगी और प्रतियोगी से भिन्न रूप में इसका) भान नहीं होता है ।
तस्मात् 'यह यहीं है' इस कथित प्रतीति से समवाय का अनुमान ही
होता है ।
॥ प्रशस्तपादभाष्य में समवाय पदार्थ का
निरूपण समाप्त हुआ ॥
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न्यायकन्दली
स्वत एवायं वृत्तिरिति। कृतको हि संयोगस्तस्य वृत्त्यात्मकस्यापि वृत्त्यन्तरमस्ति, कारणसमवा-
यस्य कार्यलक्षणत्वात्। समवायस्य वृत्त्यन्तरं नास्ति । तस्मादस्य स्वात्मना स्वरूपेणैव वृत्तिर्न
वृत्त्यन्तरेणेत्यर्थः। अत एवातीन्द्रियः सत्तादीनामिव प्रत्यशेषु वृत्त्यभावात् । यथा सत्तादीनां
प्रत्यक्षेष्वर्थेषु वृत्तिरस्ति तेन ते संयुक्तसमवायादिन्द्रियेषु गृह्यन्ते, नैवं समवायस्य वृत्तिसम्भवः।
अतोऽतीन्द्रियोऽयम्, संयोगसमवायापेक्षस्यैवेन्द्रियस्य भावग्रहणसामर्थ्योपलम्भात् ।
नहीं है, इससे समवाय द्रव्यादि में नहीं है सो बात नहीं; क्योंकि समवाय में
'सम्बन्ध' का 'तादात्म्य' है, अर्थात् वह स्वयं 'वृत्त्यात्मक' है , फलतः समवाय
स्वयं ही सम्बन्ध स्वरूप है । संयोग यतः उत्पत्तिशील वस्तु है, अतः सम्बन्धात्मक
होने पर भी उसके रहने के लिए दूसरा सम्बन्ध आवश्यक है; क्योंकि
उपादान में समवाय ही कार्य का स्वरूप है, अतः समवायिकारणरूप सम्बन्धियों में
संयोग का समवायरूप दूसरा सम्बन्ध न मानें तो संयोग समवाय सम्बन्ध
से उत्पन्न होनेवाला कार्य ही नहीं रह जाएगा । समवाय तो नित्य है, उसके
लिए दूसरे सम्बन्ध की आवश्यकता नहीं है । अतः समवाय स्वात्मक सम्बन्ध
से ही फलतः स्वरूपसम्बन्ध से ही अपने सम्बन्धियों में रहता है, किसी दूसरे
सम्बन्ध से नहीं । "अत एवातीन्द्रियः सत्तादीनामिव प्रत्यशेषु वृत्त्यभावात्" अर्थात्
प्रत्यक्ष दीखनेवाले घटादि विषयों के साथ सत्तादि पदार्थों की (स्वभिन्न समवाय
नाम की) वृत्ति (सम्बन्ध) है, अतः संयुक्तसमवाय सन्निकर्ष से उनका प्रत्यक्ष
होता है । इस प्रकार समवाय का कोई भी स्वभिन्न एवं प्रत्यक्षप्रयोजक सम्बन्ध
अपने सम्बन्धियों के साथ नहीं है, अतः समवाय अतीन्द्रिय है; क्योंकि संयोग
और समवाय इन दोनों में से किसी एक की सहायता से ही इन्द्रियों में किसी
भावपदार्थ को ग्रहण करने का सामर्थ्य है । ( प्र.) यदि समवाय का इन्द्रियों से