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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 696, कुल 759 में से

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पृष्ठ 696

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७३१
प्रशस्तपादभाष्यम्
मेवाभिसर्पणम्। ततः पूर्वद्रव्यविनाशे सति प्रबन्धेनावस्थितैरवयवैर्दीर्घं द्रव्य-
मारभ्यते । तत्र च कारणगुणपूर्वक्रमेण द्रवत्वमुत्पद्यते । तत्र च कारणानां
संयुक्तानां प्रबन्धेन गमने यद्वयविनि कर्मोत्पद्यते तत् स्यन्दनाख्यमिति ।
विनाश हो जाने पर संयुक्त रूप से अवस्थित जलावयवों से ही बड़े द्रव्य
की उत्पत्ति होती है । इस बड़े द्रव्य में कारणगुणक्रम से द्रवत्व की
उत्पत्ति होती है । वहाँ पर किनारों के साथ सम्बद्ध अवयवों का संयुक्त
रूप से गमन होने पर जो अवयवी में क्रिया उत्पन्न होती है, उसी का
नाम 'स्यन्दन' है ।
न्यायकन्दली
त्ववयवद्रवत्वस्य वृत्तिलाभो भवति, अल्पस्यावयवस्य तेन मार्गेण निर्गतिसम्भवात् । तस्य
वृत्तिलाभे चोत्तरेषामवयवद्रवत्वानामापि प्रतिबन्धकाभावाद् वृत्तिलाभः स्वकार्यकर्तृत्वं
स्यात् । ततः क्रमशः संयुक्तानामेवाभिसर्पणम् । सेतुसमीपस्थोऽवयवः प्रथममभिसर्पति,
तदनु तत्समीपस्थस्ततस्तत्समीपस्थ इत्यनेन क्रमेण सर्वेऽवयवा अभिसर्पन्ति । ते
चाभिसर्पन्तो न परस्परविभ्रंशा अभिसर्पन्ति; किन्तु तथाभिसर्पन्ति यथा परस्परसंयुक्ता
भवन्तीत्येतद्द्योतनार्थमुक्तं संयुक्तानामेवाभिसर्पणम् । न पुनरस्यायमर्थोऽप्रच्युत-
प्राच्यसंयोगानामेवाभिसर्पणमिति, संस्थानान्तरोपलम्भात् । ततः प्राक्तनसंयोगविनाशे
पूर्वद्रव्यविनाशे प्रबन्धेनावस्थितैरवयवैः संयुक्तीभावेनावस्थितैरवयवैर्दीर्घं द्रव्यमारभ्यते ।
तत्र च कारणगुणपूर्वक्रमेण द्रवत्वमुत्पद्यते । अवयवद्रवत्वेभ्यो दीर्घतरेऽ-
के द्रवत्व से कार्य करना सम्भव होने पर 'उत्तरेषामवयवद्रवत्वानापि
प्रतिबन्धकाभावाद् वृत्तिलाभः' अर्थात् अपने-अपने कार्य करने में वे समर्थ होंगे ।
"ततः क्रमशः संयुक्तानामेवाभिसर्पणम्" अर्थात् पहले बाँध के समीप का अवयव
निकलता है । उसके बाद उस अवयव के साथ संयुक्त दूसरा अवयव निकलता है ।
उनके बाद उस दूसरे अवयव के साथ सम्बद्ध तीसरा अवयव निकलता है । इसी
क्रम से जल के सभी अवयव निकल जाते हैं । जल के वे अवयव ऐसे नहीं
निकलते कि एक-दूसरे से बिलकुल अलग होकर भिन्न देशों में चले जाँय; किन्तु
इस प्रकार निकलते हैं कि जिससे परस्पर संयुक्त होकर ही निकलें । इसी
वस्तुस्थिति को सूचित करने के लिए 'संयुक्तानामेवाभिसर्पणम्' यह वाक्य लिखा
गया है । उक्त वाक्य का यह अर्थ नहीं है कि पहले के अविनष्ट संयोग से युक्त
अवयवों का ही निःसरण होता है; क्योंकि निःसरण के बाद दूसरे प्रकार के
अवयव- संयोगों से युक्त अवयवियों की उपलब्धि होती है । 'ततः' अर्थात् पहले
के संयोग के विनष्ट हो जाने पर 'पूर्वद्रव्यविनाशे प्रबन्धेनावस्थितैरवयवैः' अर्थात्
परस्पर संयुक्त होकर अवस्थित अवयवों से "दीर्घं द्रव्यमारभ्यते, तत्र च कारण-
गुणपूर्वक्रमेण द्रवत्वमुत्पद्यते" अर्थात् अवयवों में रहनेवाले द्रवत्वों से बड़े अवयवी