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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 666, कुल 759 में से

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पृष्ठ 666

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७०१
प्रशस्तपादभाष्यम्
एतत् पञ्चविधमपि कर्म शरीरावयवेषु तत्सम्बद्धेषु च सत्प्रत्ययमप्रत्ययं
च । यदन्यत् तदप्रत्ययमेव तेष्वन्येषु च, तद् गमनमिति । कर्मणां जातिपञ्च-
कत्वमयुक्तम्, गमनाविशेषात् । सर्वं हि क्षणिकं कर्म गमनमात्रमुत्पन्नं स्वाश्रयस्यो-
र्ध्वमधस्तिर्यग्गव्याप्यणुमात्रैः प्रदेशैः संयोगविभागान् करोति, सर्वत्र गमनप्रत्ययोऽ-
ये पाँचों ही प्रकार के कर्म शरीर के अवयवों में एवं उनसे सम्बद्ध
दूसरे द्रव्यों में भी प्रयत्न (सत्प्रत्यय) से और बिना प्रयत्न (अप्रत्यय)
के भी उत्पन्न होते हैं । इन दोनों से भिन्न सभी प्रकार के कर्म 'अप्रत्यय'
कर्म हैं । (अर्थात्) शरीर के अवयवों या उनसे भिन्न द्रव्यों में रहनेवाले
ये सभी अप्रत्यय-कर्म गमनरूप ही हैं ।
(प्र.) यतः सभी क्रियाओं में गमनत्व की प्रतीति समान रूप से होती
है, अतः क्रियाओं में उत्क्षेपणत्वादि पाँच जातियों का सम्बन्ध मानना
अयुक्त है । (अर्थात्) क्रियायें सभी क्षणिक हैं, वे प्रथमतः गमनरूप ही
उत्पन्न होती हैं । उत्पन्न होने के बाद अपने आश्रयद्रव्यों के ऊपर के
प्रदेश, नीचे के प्रदेश या पार्श्वप्रदेश के साथ संयोगों और विभागों को
उत्पन्न करती हैं; किन्तु सभी कर्मों में 'यह गमन है' इस प्रकार की
प्रतीति समान रूप से होती है । अतः सभी क्रियायें गमनरूप ही हैं ।
न्यायकन्दली
सप्रत्ययमिति । प्रयत्नपूर्वकमप्रयत्नपूर्वकं च भवतीत्यर्थः । यदन्यदिति । एतेषु शरीरा-
वयवेषु मुसलादिष्वन्येषु वा द्रव्येषु यत् तदप्रत्ययजं कर्म जायते सत्प्रत्ययादन्यत् तद् गमनमेव ।
चोदयति-कर्मणामिति । उत्क्षेपणादीनां कर्मणां जातिपञ्चकत्वमयुक्तम्, गमनात् सर्वेषामविशे-
षादभेदादिति चोदनार्थः । सर्वेषां गमनादविशेषमेव कथयति-सर्वं हीत्यादिना । उत्क्षेपणादि-
समझना चाहिए । अर्थात् आगे के अवयवों का मूल प्रदेश के साथ विभाग से
जिस स्थिति में उत्तर देश संयोग की उत्पत्ति होती है उस स्थिति में ।
'सत्प्रत्ययमिति' अर्थात् (कर्म दो प्रकार से उत्पन्न होते हैं) एक तो प्रयत्न से
उत्पन्न होता है, दूसरा बिना प्रयत्न के ही उत्पन्न होता है । 'यदन्यत्' अर्थात् शरीर
के अवयवों में एवं मूसल प्रभृति द्रव्यों में अथवा अन्य ही द्रव्यों में प्रयत्नजनित
क्रिया से भिन्न जिस क्रिया की उत्पत्ति होती है, वह क्रिया गमनरूप ही है ।
'कर्मणाम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा आक्षेप करते हैं । आक्षेप ग्रन्थ का यह
आशय है कि उत्क्षेपणादि में रहनेवाली उत्क्षेपणत्वादि पाँच जातियों का जो उल्लेख