सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 658, कुल 759 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 658

भाषानुवादसहितम् ६९३
प्रशस्तपादभाष्यम्
कारणः । स द्विविधो वर्णलक्षणो ध्वनिलक्षणश्च । तत्र अका-
रादिर्वर्णलक्षणः, शङ्खादिनिमित्तो ध्वनिलक्षणश्च । तत्र वर्ण-
संयोग, विभाग और शब्द (इन तीनों में से किसी) से उसकी उत्पत्ति
होती है । वह अपने आश्रयद्रव्य के किसी एकदेश में ही रहता है । वह
अपने समानजातीय (शब्द) और विजातीय (संयोग और विभाग इन दोनों) से
उत्पन्न होता है । यह १. वर्ण और २. ध्वनि भेद से दो प्रकार का है । उनमें
अकारादि शब्द वर्णरूप हैं और शङ्खादि से उत्पन्न शब्द ध्वनिरूप हैं ।
न्यायकन्दली
वर्तिनस्तूभयथा विरुध्यन्ते । संयोगविभागशब्दजः । आद्यः शब्दः संयोगाद्
विभागाच्च जायते, तत्पूर्ववस्तु शब्दादिति विवेकः ।
प्रदेशवृत्तिः अव्याप्यवृत्तिरित्यर्थः । एतच्चोपपादितम् । समानासमानजातीयेति ।
शब्दजः शब्दः समानजातीयकारणः । संयोगजविभागजश्च असमानजातीयकारणः । स
द्विविधो वर्णलक्षणः, ध्वनिलक्षणश्च । अकारादिर्वर्णलक्षणः, शङ्खादिनिमित्तो ध्वनि-
लक्षणः । तत्र तयोर्मध्ये, वर्णलक्षणस्योत्पत्तिरुच्यते । आत्ममनसोः संयोगात् पूर्वानुभूत-
वर्णस्मृत्यपेक्षात् तत्सदृशवर्णोच्चारणे कर्तव्ये इच्छा भवति । ततः प्रयत्नस्तं प्रयत्नं
निमित्तकारणमपेक्षमाणादात्मवायुसंयोगादसमवायिकारणात् कोष्ठ्यवायौ कर्म जायते । स
च वायुरूर्ध्वं गच्छन् कण्ठादीनभिहन्ति हृत्कण्ठताल्वादीन् प्रदेशानभिहन्ति । ततोऽ-
एवं अन्तिम शब्द अपने कारणीभूत अपने से अव्यवहितपूर्व के शब्द से विनष्ट
होता है; क्योंकि अन्तिम शब्द के विनाश का कोई और कारण नहीं हो सकता ।
बीच के जो शब्द हैं, कार्यशब्द और कारणीभूत शब्द दोनों ही उनके विरोधी हैं ।
'संयोगविभागशब्दजः' अर्थात् प्रथम शब्द (कभी संयोग से और कभी) विभाग से
उत्पन्न होता है, अतः उनके दोनों ही कारण हैं । मध्य के सभी शब्द शब्द से ही
जन्म लेते हैं । 'प्रदेशवृत्तिः' अर्थात् शब्द अव्याप्यवृत्ति है (अपने आश्रय के सभी
देशों में नहीं रहता) । 'शब्द किस प्रकार अव्याप्यवृत्ति है' इसका उपपादन (शब्द
के साधर्म्यप्रकरण में) कर चुके हैं । 'समानासमानजातीयेति' शब्द से जिस शब्द
की उत्पत्ति होती है, वह समानजातीयकारणक है । संयोग और विभाग से जिन
शब्दों की उत्पत्ति होती है, उनके कारण शब्द के असमानजातीय हैं ।
'स द्विविधो वर्णलक्षणो ध्वनिलक्षणश्च' अकारादि वर्णलक्षण शब्द हैं एवं शङ्ख
प्रभृति से जो शब्द उत्पन्न होते हैं, वे ध्वनिलक्षण शब्द हैं । 'तत्र' अर्थात् उन दोनों
प्रकार के शब्दों में वर्णलक्षण शब्द की उत्पत्ति (की रीति) कहते हैं । अनुभूत वर्ण
की स्मृति के साहाय्य से आत्मा और मन के संयोग के द्वारा सर्वप्रथम उस वर्ण के