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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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पृष्ठ 518

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ५५३
न्यायकन्दली
दत्तः स्वहस्तो निरालम्बनं विज्ञानमिच्छतां महायानिकानाम् । अथ भूतलमालम्बनम् ?
कण्टकादिमत्यपि भूतले कण्टको नास्तीति संवित्तिः, तत्पूर्वकश्च निःशङ्कं गमनागमनलक्षणो
व्यापारो दुर्निवारः । केवलभूतलविषयं 'नास्तीति' संवेदनम्, कण्टकसद्भावे च कैवल्यं
निवृत्तमिति प्रतिपत्तिप्रवृत्त्योरभाव इति चेत् ? ननु किं कैवल्यं भूतलस्य स्वरूपमेव ?
किमुत धर्मान्तरम् ? स्वरूपं तावत् कण्टकादिसंवेदनेऽप्यपरावृत्तमिति स एव
प्रतिपत्तिप्रवृत्त्योर्विरामो दोषः । धर्मान्तरपक्षे च तत्त्वान्तरसिद्धिः ।
अथ मन्यसे भाव एवैकाकी सद्वितीयश्चेति द्वयीमवस्थामनुभवति
तत्रैकाकीभावः स्वरूपमात्रमिति केवल इति चोच्यते, तादृशस्य तस्य दृश्ये
कि 'नास्ति' इस आकार की बुद्धि का विषय (प्रमेय) कौन है ? इस प्रशन के
उत्तर में वे यदि यह कहें कि (प्र.) उस बुद्धि का कोई भी विषय नहीं है; क्योंकि
उक्त भाष्य और वार्तिक दोनों ही में 'प्रत्यक्षादि पाँचों प्रमाणों की अनुत्पत्ति' को ही
'अभाव' प्रमाण कहा गया है । किसी के भी मत से स्मृति प्रमाण नहीं है, अतः
स्मृति के किसी भी अभाव का प्रामाण्य भाष्य और वार्तिक के द्वारा अनुमोदित
नहीं हो सकता । (उ.) तो फिर बिना विषय के ही विज्ञान की इच्छा करनेवाले
महायान के अनुयायियों की ही तरफ आप अपना हाथ बढ़ाते हैं । यदि इस प्रश्न
के उत्तर में यह कहें कि (प्र.) (कण्टकाभावादि का) भूतल रूप आश्रय ही उक्त
'नास्ति' प्रत्यय का विषय है, (उ.) तो फिर काँट प्रभृति से युक्त भूतल में भी
'कण्टको नास्ति' इस आकार की बुद्धि होगी, जिससे कि (निष्कण्टक भूमि की
तरह) काँटों से युक्त भूतल में भी निःशङ्क होकर आना-जाना सम्भव हो जाएगा ।
(प्र.) 'नास्ति' इस प्रकार की उक्त बुद्धि का 'केवल' भूतल ही विषय है । काँट के
रहने पर भूतल से यह 'कैवल्य' हट जाता है, अतः भूतल में काँट के न रहने पर
भूतल में 'कण्टको नास्ति', न इस 'प्रतिपत्ति' की आपत्ति ही होती है और न
गमन और आगमन की निःशङ्क प्रवृत्ति ही हो पाती है । (उ.) इस प्रसङ्ग में पूछना
है कि भूतल का यह 'कैवल्य' भूतल स्वरूप है या उससे भिन्न कोई दूसरा धर्म है ?
(यदि पहला पक्ष मानें तो फिर) भूतल में कण्टकादि ज्ञान के समय भी (भूतल
स्वरूप वह) कैवल्य है ही । अतः इस पक्ष में भी उक्त निःशङ्क प्रवृत्ति की और
कण्टक के रहने पर भी भूतल में 'कण्टको नास्ति' इस ज्ञान की आपत्ति रहेगी
ही । यदि कैवल्य को भूतल से भिन्न कोई दूसरा धर्म मानें तो (अभाव की तरह)
किसी दूसरे पदार्थ का मानना आवश्यक ही होगा ।
यदि यह कहें कि (प्र.) भाव की दो अवस्थायें होती हैं-(१) एकाकी
अवस्था और (२) सद्वितीयावस्था । इनमें 'एकाकी' अवस्था से युक्त भूतल
ही 'स्वरूप मात्र' कहलाता है । इस केवल भूतल में (घटाभाव के) प्रतियोगी