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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 759 में से

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पृष्ठ 343

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३८१
प्रशस्तपादभाष्यम्
भावात् परस्परतः संयोगविभागाभाव इति। दिगादीनां तु पृथग्गतिमत्त्वाभावादिति
परस्परेण संयोगविभागाभाव इति ।
तन्तु और अनित्य पट के अलग से स्वतन्त्र आश्रय नहीं रहते, अतः यह
सिद्ध होता है कि इन दोनों में संयोग और (तन्मूलक) विभाग नहीं होते ।
दिगादि (विभु द्रव्यों में) स्वतन्त्र गति न रहने के कारण ही उनमें
परस्पर संयोग और विभाग दोनों ही नहीं होते ।
न्यायकन्दली
मत्त्वात् संयोगविभागौ सिद्धाविति । पूर्वमसत्यपि पृथग्गतिमत्त्वे त्वगिन्द्रियशरीरयोः
पृथगाश्रयाश्रयित्वे सति संयोगसम्भवादनित्यानां पृथगाश्रयाश्रयित्वं युतसिद्धिर्न पृथग्गमन-
मित्यक्तम् ।
सम्प्रत्येनमेवार्थं समर्थयितुं तन्तुपटयोरन्यतरस्य पृथग्गतिमत्त्वासम्भवेऽपि पृथगाश्रयत्वा-
भावात् संयोगविभागाभावं दर्शयति-तन्तुपटयोरित्यादिना । विभूनां तु द्वयोरन्यतरस्य
वा पृथग्गमनाभावान्न परस्परेण संयोगः, नापि विभागः, तस्य संयोगपूर्वकत्वात्; किन्तु
स्वरूपस्थितिमात्रमित्याह-दिगादीनामिति । एतावता सन्दर्भेणैतदुपपादितम्, हस्ते गच्छति
शरीरं न गच्छतीति, एतावता न युतसिद्धिः । यदि तु हस्तशरीरयोः पृथगाश्रयाश्रयित्वं
स्यात्, तदा भवेद्दनयोर्युतसिद्धता । तत्तु नास्ति, शरीरस्य हस्ते समवेतत्वात् ।
अनित्य द्रव्य पृथक् गतिशील हैं एवं इनमें परस्पर संयोग और विभाग भी होते हैं
। अतः पृथक् गमनशीलता ही अनित्यों की युतसिद्धि है । इसी अभिप्राय से 'अणु'
इत्यादि सन्दर्भ लिखे गये हैं । अर्थात् परमाणु और आकाश इन दोनों का दूसरा
कोई आश्रय न रहने पर भी चूँकि दोनों में से एक (अर्थात् परमाणु) स्वतन्त्र रूप
से गतिशील है । अतः आकाश और परमाणु (दोनों के युतसिद्ध होने के कारण)
इन दोनों में संयोग और विभाग की सिद्धि होती है । पहले पृथक् गति न रहने
पर भी त्वगिन्द्रिय और शरीर में पृथगाश्रयाश्रयित्व के रहने के कारण दोनों में
संयोग सम्भव होता है । इसीलिए कहा गया है कि पृथगाश्रयाश्रयित्व ही अनित्यों
की युतसिद्धि है, पृथक् गमन नहीं ।
तन्तु और पट इन दोनों में से एक में पृथक् गति की सम्भावना न
रहने पर भी, पृथक् आश्रयत्व के न रहने से ही दोनों में संयोग और विभाग
नहीं होते, यही बात 'तन्तुपटयोः' इत्यादि सन्दर्भ से दिखलाया गया है ।
'दिगादीनाम्' इत्यादि सन्दर्भ से यह प्रतिपादित हुआ है कि दो विभुद्रव्यों में या दो
में से किसी एक विभुद्रव्य में भी पृथक् गति नहीं है । अतः दो विभुद्रव्यों
में परस्पर संयोग नहीं होता । संयोग के न होने के कारण ही दोनों में विभाग
भी नहीं होता; क्योंकि संयुक्तद्रव्यों में ही विभाग भी होता है । इन पङ्क्तियों
के द्वारा यही कहा गया है कि हाथ के चलने पर भी शरीर नहीं चलता,