सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 759 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 255

२९८ न्यायकिन्दलीसहितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
न्यायकन्दली
विशेषात् । तां तु सारूप्यमाविशत् सरूपयितुं घटयेदिति । अत्रोच्यते-साकारेण ज्ञानेन किम-
र्थोऽनुभूयते ? किंवा स्वाकारः ? किमुतोभयम् ? न तावदुभयम्, नीलमेतदित्येकस्यैवाकार-
स्य सर्वदा संवेदनात् । अर्थस्य च ज्ञानेनानुभवो न युक्तः, तस्य स्वरूपसत्ताकाले ज्ञानानुत्पा-
दाज्ज्ञानकाले चातीतस्य वर्तमानतावभासायोग्यात् । ज्ञानसहभाविनः क्षणस्यायं वर्तमानताव-
भास इति स्वसिद्धान्तश्रद्धालुतैवम्, तस्य तदग्राह्यत्वात् । कश्चात्र हेतुर्यद्विज्ञानं नियतमर्थं बोधयति
न सर्वम् ? न हि तयोरस्ति तादात्म्यम्, तदुत्पत्तिश्च न व्यवस्ताहेतुरित्युक्तम् । तदाकारता
नियमहेतुरिति चेत् ? किमित्येको नीलक्षणः समानाकारं नीलान्तरं न गृह्णाति ? ग्राहकत्वं
ज्ञानस्यैव स्वभावो नार्थस्येति चेत् ? तथाप्येकं नीलज्ञानं सर्वेषां नीलक्षणानां ग्राहकं स्यात्,
तदाकारत्वाविशेषात् । तदुत्पत्तिसारूप्याभ्यां स्वोत्पादकस्यैवार्थक्षणस्य ग्राह्यता न सर्वेषामिति
से वस्तुओं का ज्ञान सम्भव नहीं है; क्योंकि वह सभी वस्तुओं में समान रूप से हैं;
किन्तु उसमें विषयाकारता का प्रवेश होने पर उसी से विषयों का अवभास होता
है । (प्र.) इस प्रसङ्ग में मेरा कहना है कि आकार से युक्त ज्ञान के द्वारा अर्थ की
अनुभूति होती है ? या उसके अपने आकार का ही अनुभव होता है ? अथवा
आकार एवं वस्तु दोनों का ही अनुभव होता है ? दोनों का अनुभव तो उससे होता
नहीं; क्योंकि 'यह नील है' इससे एक ही आकार का अनुभव होता है । एवं ज्ञान
के द्वारा अर्थ का अनुभव सम्भव भी नहीं है; क्योंकि अर्थ के अस्तित्व के समय
ज्ञान की उत्पत्ति नहीं हो सकती । एवं ज्ञान के अस्तित्व के समय वस्तुएँ अतीत हो
जाती हैं, अतः वर्त्तमानत्वविषयक वस्तुओं की 'घटोऽस्ति' इत्यादि प्रतीतियाँ असम्भव
हैं । 'घटोऽस्ति' इत्यादि आकार की प्रतीतियों में भासित होनेवाला वर्त्तमानत्व
घटादि अर्थों का नहीं; किन्तु ज्ञान के साथ उत्पन्न होनेवाले क्षण का है, यह कहना
केवल अपने सिद्धान्त में अत्यन्त श्रद्धा प्रकट करना है; क्योंकि वर्त्तमानत्व उस
ज्ञान का ग्राह्य ही नहीं है । एवं इसमें भी कारण कहना पड़ेगा कि एक ज्ञान
किसी नियत विषय को ही ग्रहण करे, सभी विषयों को नहीं । पहले कह चुके हैं
कि वस्तु विज्ञान से अभिन्न नहीं है । यह भी कह चुके हैं कि विज्ञान की उत्पत्ति
(यह ज्ञान इसी विषय का बोधक है, दूसरे ज्ञान का नहीं, इस) व्यवस्था का
कारण नहीं है । (उ.) तदाकारता ही (अर्थात् जिसमें जिस अर्थ की आकारता है,
फलतः जो ज्ञान यदाकारक है वही उसका नियामक है) इस नियम का कारण
होगी । (प्र.) तो क्या एक नील क्षण (का ग्राहक विज्ञान) समान आकार के दूसरे
नील को भी ग्रहण नहीं करता है ? (उ.) ग्राहकत्व अर्थात् अर्थ को ग्रहण करना
तो ज्ञान का स्वभाव है, अर्थ का नहीं । (प्र.) फिर भी एक ही नील विज्ञान सभी
नील क्षणों का ग्राहक होगा; क्योंकि सभी नील क्षणों के आकार में तो कोई अन्तर
नहीं है । (उ.) वस्तुओं की उत्पत्ति एवं (ज्ञान में) उसका आकारतारूप सादृश्य