वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 194, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २३९
प्रशस्तपादभाष्यम्
संयोगविभागवेगाः कर्मजाः ।
शब्दोत्तरविभागौ विभागजौ ।
परत्वापरत्वद्वित्वद्विपृथक्त्वदयो बुद्धयपेक्षाः ।
संयोग, विभाग और वेग ये तीन गुण क्रिया से उत्पन्न होते हैं !
शब्द और उत्तर (विभागज) विभाग ये दोनों विभाग से उत्पन्न होते
हैं ।
परत्व, अपरत्व, द्वित्व, द्विपृथक्त्व प्रभृति बुद्धिसापेक्ष हैं ।
न्यायकन्दली
उत्तरसंयोगः संयोगजः संयोगोऽभिमतः । नैमित्तिकद्रवत्वं वह्निसंयोगजम् । परत्वापरत्वे
दिक्कालपिण्डसंयोगजे । पार्थिवपरमाणुरूपरसगन्धस्पर्शा वह्निसंयोगजा इति विवेकः ।
संयोगविभागवेगाः कर्मजाः । आद्यौ संयोगविभागौ कर्मजौ ।
शब्दोत्तरविभागौ विभागजौ । आद्यः शब्दो विभागादपि जायते, उत्तरो विभागो
विभागादेव जायत इति विवेकः ।
परत्वापरत्वद्वित्वद्विपृथक्त्वदयो बुद्धयपेक्षाः । एषामुत्पत्तौ निमित्तकारणं बुद्धिः ।
आदिशब्दात् त्रित्वत्रिपृथक्त्वादिपरिग्रहः ।
संयोग ही यहाँ 'उत्तरसंयोग' शब्द से इष्ट है । वह्नि के संयोग से नैमित्तिक द्रवत्व
की उत्पत्ति होती है । द्रव्यों के साथ दिशा एवं काल के संयोग से परत्व एवं
अपरत्व की उत्पत्ति होती है । पार्थिव परमाणुओं के रूप, रस, गन्ध और स्पर्श ये
सभी (विशेष प्रकार के) वह्निसंयोग रूप पाक से उत्पन्न होते हैं (अतः संयोगज
होते हुए भी अपाकज नहीं हैं) ।
संयोग, विभाग और वेग ये तीनों क्रिया से उत्पन्न होते हैं । पहला संयोग
और पहला विभाग ये दोनों ही क्रिया से उत्पन्न होते हैं (द्वितीय संयोग की उत्पत्ति
संयोग से एवं द्वितीय विभाग की उत्पत्ति विभाग से ही होती है) ।
शब्द और उत्तर विभाग दोनों ही विभाग से उत्पन्न होते हैं । यह ध्यान
रखना चाहिए कि (इनमें) प्रथम शब्द विभाग से भी उत्पन्न होता है, किन्तु उत्तर
विभाग केवल विभाग से ही उत्पन्न होता है ।
परत्व, अपरत्व, द्वित्व, द्विपृथक्त्वदि 'बुद्धिसापेक्ष' हैं, अर्थात् इन सबों की
उत्पत्ति में बुद्धि निमित्तकारण है ! 'आदि' पद से त्रित्व एवं त्रिपृथक्त्व प्रभृति को
समझना चाहिए ।