वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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अण्डज हैं । स्वेदज और उद्भिज्जादि के शरी अयोनिज हैं । स्वेदज हैं कृमि
प्रभृति और उद्भिज्ज हैं वृक्षादि । नारकीय शरीर भी अयोनिज ही हैं । जल रूप
समवायिकारण और शेष चार भूत द्रव्य रूप निमित्तकारणों से उत्पन्न शरीर
जलीय शरीर है, जो 'वरुणलोक' में प्रसिद्ध है । तेज रूप समवायिकारण औरशेष
चार भूत द्रव्य रूप निमित्तकारणों से उत्पन्न शरीर 'तैजस शरीर' कहलाता है, जो
'सूर्यलोक' में प्रसिद्ध है । वायु रूप समवायिकारण और शेष चारों भूत द्रव्य रूप
निमित्तकारणों से जिस शरीर का निर्माण होता है, वह वायवीय शरीर कहलाता
है । पिशाचादि का शरी वायवीय शरीर है ।
घ्राण, रसना, चक्षु, त्वचा, श्रौत्र औरम न ये छः ईन्द्रियाँ हैं । हाथ, पैर प्रभृति
शरीर के अवयव मात्र हैं, इन्द्रिय नहीं । इनमें श्रोत्र आकाश रूप है, अतः नित्य
है । और मन परमाणु रूप है, अतः नित्य है । चक्षुरादि शेष चार इन्द्रियाँ क्रमशः
पृथिवी, जल, तेज और वायु रूप द्रव्य से उत्पन्न होती हैं । इनमें घ्राण पार्थिव हैं,
रसना जलीय है, चक्षु तैजस है और त्वचा वायवीय है । फलतः घ्राण पृथिवी है,
रसना जल है, चक्षु तेज है और त्वचा वायु है । इस प्रकार घ्राण प्रभृति चार
इन्द्रियाँ पृथिवी प्रभृति चार भूतों से उत्पन्न होने के कारण 'भौतिक' हैं ।
श्रवणेन्द्रिय आकाश रूप है आकाश से उत्पन्न नहीं; क्योंकि आकाश नित्य है ।
नित्य द्रव्य किसी द्रव्य का समवायिकारण नहीं हो सकता, अतः 'श्रवणेन्द्रिय' स्वयं
भूत-द्रव्य होने के कारण ही 'भौतिक' कहलाता है । मन भौतिक नहीं है ।
मिट्टी प्रभृति 'विषय' रूप पृथिवी हैं, सरिता, समुद्रादि 'विषय' रूप जल हैं ।
वह्नि एवं सुवर्णादि 'विषय' रूप तेज हैं । जिससे आँधी प्रभृति होती हैं, वे सभी
वायु विषय रूप हैं । शरीरादि तीनों प्रकारों से भिन्न वायु का 'प्राण' नाम का
चौथा प्रकार भी है । शरीर के भीतर चलनेवाली वायु को 'प्राण' कहते हैं; किन्तु
कार्य-भेद से और स्थान-भेद से उसके प्राण, अपान, समान और व्यान ये चार
नाम प्रसिद्ध हैं । शाखादि के कम्प से वायु का केवल अनुमान ही होता है, प्रत्यक्ष
नहीं; क्योंकि रूपी द्रव्य का ही प्रत्यक्ष होता है । किसी का मत है कि वायु का भी
स्पार्शनप्रत्यक्ष होता है । द्रव्य के चाक्षुषप्रत्यक्ष के लिए ही द्रव्य में रूप का रहना
आवश्यक है ।
नित्य द्रव्यों में पृथिव्यादि चारों प्रकार के परमाणुओं का उल्लेख कर चुके हैं ।
वैशेषिकों का कहना है कि घटादि कार्यद्रव्यों का नाश प्रत्यक्षसिद्ध है । विनाश की
परम्परा का विश्राम कहीं पर मानना आवश्यक है । ऐसा न मानने पर राई और
पर्वत दोनों को एक परिमाण का मानना पड़ेगा; क्योंकि राई का विनाश भी
अनन्त खण्डों में होगा और पहाड़ का भी विनाश अनन्त खण्डों में होगा । अतः
दोनों अनन्त खण्डों से निर्मित होने कारण समान परिमाण के होंगे; किन्तु यह