वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ११
विभाग भी । अतः सभी द्रव्य संयोग या विभाग के समवायिकारण हैं । संयोग
और विभाग का समवायिकारण होना या समवायिकारणत्व नाम का धर्म ही
द्रव्यत्व जाति का ज्ञापक है । संयोग और विभाग का यह समवायिकारणत्व
गुणादि पदार्थों में नहीं है, अतः गुणादि पदार्थ संयोग और विभाग के
समवायिकारण नहीं हैं अतः उनमें द्रव्यत्व नहीं है । इसी प्रकार गुणत्वादि सभी
पदार्थविभाजक धर्मों में समझना चाहिए ।
पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन ये द्रव्य के
नौ प्रकार (भेद) हैं । इन सभी द्रव्यों को नित्य और अनित्य भेद से दो भागों में
बाँटा जा सकता है । पृथिवी, जल, तेज, वायु इन चार द्रव्यों के परमाणु और
आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन ये सभी द्रव्य नित्य हैं । एवं कथित
परमाणुओं से भिन्न पृथिव्यादि चारों द्रव्य के सभी प्रभेद उत्पत्तिशील होने के कारण
अनित्य हैं । अनित्य द्रव्यों में से पृथिव्यादि तीन द्रव्यों को शरीर, इन्द्रिय और
विषय इन तीन भागों में विभक्त किया गया है; किन्तु वायु का इन तीनों से भिन्न
'प्राण' नाम का एक चौथा भेद भी है ।
आत्मा विभु है, अतः सभी मूर्त द्रव्यों के साथ उसका संयोग है; किन्तु सुख-
दुःखों का अनुभव, अर्थात् भोग वह शरीर में ही करता है, अतः शरीर के साथ
उसका और मूर्त द्रव्यों से विलक्षण प्रकार का अवच्छेदकत्व नाम का सम्बन्ध है ।
इस सम्बन्ध के कारण ही शरीर को आत्मा के भोग करने का 'आयतन' कहा
जाता है । फलतः आत्मा के भोग का आयतन ही 'शरीर' है । यह शरीर भी
पार्थिव, जलीय, तैजस और वायवीय भेद से चार प्रकार का है । इनमें मानव
शरीर पार्थिव है; क्योंकि इस शरीर का उपादान पृथिवी रूप द्रव्य ही है । यद्यपि
जलादि और द्रव्यों का भी सम्बन्ध इसमें प्रतीत होता है, फिर भी वे इसके
उपादान या समवायिकारण नहीं हैं, निमित्तकारण हैं । पृथिवी से लेकर
आकाशपर्यन्त सभी भूतद्रव्य शरीर के बनने में हेतु हैं, अतः शरीर पाञ्चभौतिक
भी कहलाता है । अस्मदादि के शरीर का उपादानकारण या समवायिकारण
पृथिवी रूप द्रव्य ही है, अतः उसे पार्थिव कहा जाता है । वैशेषिक सिद्धान्त के
अनुसार शरी रका समवायिकारण पृथिवी, जल, तेज, वायु इन चारों में से कोई
एक ही है, शेष चार उसके निमित्तकारण हैं । अतः पृथिवी रूप उपादान से
उत्पन्न हम लोगों का शरीर पार्थिव है । पार्थिव शरीर के (१) योनिज और (२)
अयोनिज दो भेद हैं । योनिज शरी के भी दो भेद हैं (१) जरायुज और
(२) अण्डज । जरायुज मानुषादि के शरीर हैं और पशु-पक्षी आदि के शरीर