वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 129, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ें५६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य-
प्रशस्तपादभाष्यम्
अनाश्रितत्वनित्यत्वे चान्यत्रावयविद्रव्येभ्यः ।
पृथिव्युदकज्वलनपवनात्ममनसामनेकत्वापरजातिमत्त्वे ।
क्षितिजलज्योतिरनिलमनसां क्रियावत्त्वमूर्त्तत्वपरत्वापरत्व-
अवयवी द्रव्यों को छोड़कर और सभी द्रव्यों के अनाश्रितत्व और
नित्यत्व ये दो साधर्म्य हैं ।
पृथिवी, जल, तेज, वायु, आत्मा और मन इन छः द्रव्यों के
अनेकत्व और अपरजातिमत्त्व ये दो साधर्म्य हैं ।
पृथ्वी, जल, तेज, वायु और मन इन पाँच द्रव्यों के क्रिया, मूर्त्तत्व,
न्यायकन्दली
अनित्यद्रव्याणां कारणविनाशयोः सम्भवेऽपि कारणेन न विनाशः, किन्त्वन्येनेति
विवेकः । तथा अन्त्यविशेषवत्त्वमन्य विशेषयोगित्वमित्यर्थः ।
अनाश्रितत्वं क्वचिदप्यसमवेतत्वम्, नित्यत्वं विनाशरहितत्वञ्च द्रव्याणां साधर्म्यम् ।
तत् किं सर्वेषां साधर्म्यमित्यत आह-अवयविद्रव्येभ्योऽन्यत्रेति । अवयविद्रव्याणि
परित्यज्यान्त्यविशेषवत्त्वानाश्रितत्वनित्यत्वान्यन्यत्र सन्तीत्यर्थः । न केवलं पूर्वोक्ताः
पृथिव्यादीनां धर्माः, किन्त्वनाश्रितत्वनित्यत्वे चेति चार्थः ।
पृथिव्यादीनां द्रव्याणामेव परस्परसाधर्म्यं वैधर्म्यञ्च प्रतिपादयन्नाह-पृथिव्युदक-
ज्वलनपवनात्ममनसामिति । अनेकत्वं प्रत्येकं व्यक्तिभेदः । अपरजातिमत्त्वमिति
पृथिवीत्वादिजातिसम्बन्धित्वम् ।
से नहीं होता है, अन्य वस्तुओं से होता है । इसी प्रकार 'अन्त्यविशेष' शब्द का
अर्थ है अन्त्यविशेष का सम्बन्ध ।
कभी भी समवाय सम्बन्ध से न रहना ही 'अनाश्रितत्व' शब्द का अर्थ है ।
'नित्यत्व' शब्द का अर्थ है नाश को प्राप्त न होना, 'अनाश्रितत्व' और 'नित्यत्व'
ये दोनों ही द्रव्य के साधर्म्य हैं । ये दोनों क्या सभी द्रव्यों के साधर्म्य हैं ? इसी
प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि "अवयविद्रव्येभ्योऽन्यत्र" अर्थात् अवयविद्रव्यों को
छोड़कर और सभी द्रव्यों में अन्त्यविशेष, अनाश्रितत्व और अनित्यत्व ये तीनों
रहते हैं । 'च' शब्द से यह अभिप्रेत है कि पृथिवी प्रभृति द्रव्यों के पहले कहे हुए
साधर्म्य ही नहीं हैं, किन्तु प्रकृत अनाश्रितत्व और नित्यत्व भी उनके साधर्म्य हैं ।
पृथिव्यादि द्रव्यों में ही परस्पर साधर्म्य और वैधर्म्य का निरूपण करते हुए
"पृथिव्युदकज्वलनपवनात्ममनसाम्" इत्यादि सन्दर्भ कहते हैं । प्रत्येक व्यक्ति में
परस्पर भेद ही 'अनेकत्व' शब्द का अर्थ है । 'अपरजातिमत्त्व' शब्द से पृथिवी-
त्वादि जातियों की अधिकरणता अभिप्रेत है ।