सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 160 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 62

५८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
उसी में दूसरा कार्य गुण 'स्पर्श' भी वर्त्तमान देखा जाता है। इसी प्रकार
'रस' का लिङ्ग 'गन्ध' भी होता है ॥ १० ॥ विरोधी लिङ्ग, जैसे:-
१२७-विरोध्यभूतं भूतस्य ॥ ११ ॥
(अभूतम्) अवर्त्तमान [वर्षा] (भूतस्य) वर्त्तमान वर्षा का (विरोधी)
विरोधी [लिङ्ग है] ॥
वर्षा का अभाव, हुई वर्षा का विरोधी लिङ्ग है ॥ ११ ॥ इसी प्रकार:-
१२८-भूतमभूतस्य ॥ १२ ॥
(भूतम्) जो है, वह (अभूतस्य) न हुवे का [विरोधी लिङ्ग है] ॥
वर्त्तमान वर्षा, न वर्त्तमान वर्षा का लिङ्ग है ॥ १२ ॥ तथा-
१२९-भूतं भूतस्य ॥ १३ ॥
(भूतम्) जो है वह (भूतस्य) हुवे का [विरोधी लिङ्ग है] ॥
वर्त्तमान मण्डलाता हुआ सर्प, वर्त्तमान झाड़ के नीचे स्थित नकुल का
लिङ्ग है। यह भी विरोधी लिङ्ग है ॥
शेष संयोगी लिङ्ग का उदाहरण, जैसे-विलक्षण गति वाले रथों को
देखकर तत्संयुक्त चतुर सारथियों का अनुमान करना। विद्वान् विद्यार्थियों
को देखकर अनुभवी अध्यापकों को पहचानना इत्यादि । समवायी लिङ्ग,
जैसे-स्पर्श से वायु का, रूप से तेज का, गन्ध से पृथिवी का पहचानना
लिङ्ग है इत्यादि ॥ १९ ॥
इस प्रकार सब प्रकार के लिङ्गों को जान कर लिङ्गी जीवात्मा का दे-
हेन्द्रियसङ्घात से पृथक् होना सिद्ध है। यही बात सांख्यदर्शन अध्याय १
सूत्र २ और ३ में भी नीचे लिखे अनुसार वर्णित है। यथा-
देहादिव्यतिरिक्तोऽसौ वैचित्र्यात् ॥ २ ॥
वह (आत्मा) विचित्र होने से, देहादि से भिन्न (वस्तु) है ॥
देह, इन्द्रियां, मन इत्यादिसंघात जड़ है, आत्मा इस से विचित्र चेतन
है, इस लिये देहादि का ही नामान्तर आत्मा नहीं है, किन्तु इस से भिन्न
आत्मा विचित्र है ॥ २ ॥
षष्ठीव्यपदेशादपि ॥ ३ ॥
षष्ठी (विभक्ति) के व्यपदेश से भी (आत्मा देहादि से भिन्न सिद्ध है)।