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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 160 में से

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पृष्ठ 57

तृतीयाऽध्याय १ आह्निक ५३
उ०-शरीर और इन्द्रियों के उपघात होने से ( पूर्वपक्ष ) ठीक नहीं ॥
इस सूत्र में गोतम मुनि अपना अन्तिम सिद्धान्त कहते हैं । हम नित्य
आत्मा के वध को हिंसा नहीं कहते किन्तु कार्याश्रय शरीर और विषयोप-
लब्धि के कारण इन्द्रियों के उपघात ( जिस से आत्मा में विकलता उत्पन्न
होती है ) को हिंसा कहते हैं । सुख दुःखरूप कार्य हैं, उन का संवेदन शरीर
के द्वारा किया जाता है, इस लिये वह कार्याश्रय कहाता है और इन्द्रियों से
विषयों का ग्रहण किया जाता है, इस लिये उन में कर्तृत्व का व्यपदेश किया
है तो बस शरीर और इन्द्रियों के प्रबन्ध का जो उच्छेद करना है, इसी का
नाम हिंसा है, इस लिये हमारे मत में उक्त दोष नहीं आता ॥
अब आत्मा के देहादि संघात से भिन्न होने में दूसरा हेतु देते हैं:-
सव्यदृष्टस्येतरेण प्रत्यभिज्ञानात् ॥ ७ ॥
उ०-बाईं आंख से देखी हुई वस्तु का दाहिनी आंख से प्रत्यभिज्ञान
होने से ( आत्मा देहादि से पृथक् है ) ॥
पूर्वापर ज्ञान के मेल को प्रत्यभिज्ञान कहते हैं । जैसे-यह वही यज्ञदत्त
है जिस को मैंने वाराणसी में देखा था । बाईं आंख से देखी हुई वस्तु की जो
दाहिनी आंख से प्रत्यभिज्ञा होती है इस से सिद्ध होता है कि उस प्रत्यभिज्ञा
का कर्त्ता इन्द्रियों से भिन्न कोई और ही पदार्थ है । यदि इन्द्रिय ही चेतन
होते तो बाईं आंख से देखी हुई वस्तु को दाईं आंख कभी नहीं पहचान
सकती थी, क्योंकि देवदत्त के देखे हुये को यज्ञदत्त नहीं जान सकता ॥
इस पर आक्षेप करते हैं:-
नैकस्मिन्नासास्थिव्यवहिते द्वित्वाभिमानात् ॥ ८ ॥
पू०-नाक की हड्डी का आवरण होने से एक में दो का अभिमान होने
से ( यह कथन ) युक्त नहीं है ॥
वास्तव में चक्षु इन्द्रिय एक ही है, नाक की हड्डी के बीच में आजाने
से लोगों को दो की भ्रान्ति हो रही है । जैसे किसी तड़ाग में पुल बान्ध
देने से दो तड़ाग नहीं हो जाते, ऐसे ही एक मस्तक में नाक का व्यवधान
होने से आंख दो वस्तु नहीं हो सकतीं । अतएव प्रत्यभिज्ञा कैसी ?
अब इस आक्षेप का समाधान करते हैं:-
एकविनाशे द्वितीयाऽविनाशान्नैकत्वम् ॥ ९ ॥