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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 160 में से

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पृष्ठ 55

तृतीयाध्याय १ आन्हिक ५१
जिस विषय को हम आंख से देखते हैं, उसी को त्वचा से स्पर्श भी
करते हैं । नींबू को देखकर रसना में पानी भर जाता है । यदि इन्द्रिय ही
चेतन होते तो ऐसा कदापि नहीं हो सकता था, क्योंकि "अन्यदृष्टमन्यो न
स्मरति" देवदत्त के देखे हुवे अर्थ का यज्ञदत्त को कभी स्मरण नहीं होता ।
फिर आंख के देखे हुवे विषय का जिह्वा से वा त्वचा से क्योंकर अनुभव
किया जाता । जो कि हम बिना किसी सन्देह के एक इन्द्रिय के अर्थ को
दूसरे इन्द्रिय से ग्रहण करते हैं, इस से सिद्ध है कि उस अर्थ के ग्रहण करने
में इन्द्रिय स्वतन्त्र नहीं हैं, किन्तु इन के अतिरिक्त ग्रहीता कोई और है
जो इन के द्वारा एककर्त्तृक अनेक प्रत्ययों को ग्रहण करता है और वही
चेतन आत्मा है ॥ अब इस पर शङ्का करते हैं:-
न, विषयव्यवस्थानात् ॥ २ ॥
पू०-उक्त कथन ठीक नहीं है, विषयों की व्यवस्थिति होने से ॥
देहादि संघात के अतिरिक्त और कोई आत्मा नहीं है, विषयों की व्यवस्था
होने से । इन्द्रियों के विषय नियत हैं, आंख के होने पर रूप का ज्ञान होता है,
न होने पर नहीं होता और यह नियम है कि जो जिस के होने पर होता
और न होने पर नहीं होता, वह उसी का समझा जाता है । इस लिये
रूपज्ञान नेत्र का है क्योंकि वही उस को देखता है। इसी प्रकार अन्य इन्द्रिय
भी अपने २ अर्थज्ञान में स्वतन्त्र हैं । जब इन्द्रियों के होने से ही विषयों
की उपलब्धि होती है तब उस से भिन्न अन्य किसी चेतन की कल्पना क्यों
की जाय ? अब इस का समाधान करते हैं:-
तद्व्यवस्थानादेवात्मसद्भावादप्रतिषेधः ॥ ३ ॥
उ०-उक्त विषयव्यवस्थिति से ही आत्मा की सिद्धि होने से निषेध नहीं
हो सकता ॥
इन्द्रियों के विषयों की व्यवस्था होने से ही (उन से भिन्न चेतन)
आत्मा की सत्ता माननी पड़ती है । यदि इन्द्रियों के विषय नियत न होते:
अर्थात् एक इन्द्रिय से दूसरे इन्द्रिय के विषय का भी ग्रहण हो सकता, तब
तो उन में स्वतन्त्रता की कल्पना की जासकती थी । परन्तु जिस दशा में कि
उन के विषय नियत हैं अर्थात् आंख से रूप का ही ग्रहण होता है, न कि
गन्धादि अन्य विषयों का । इस से यह सिद्ध होता है कि सब विषयों का