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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 160 में से

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पृष्ठ 53

ओ३म्
अथ तृतीयोऽध्यायः
पृथिवी आदि 9 सात बाह्य द्रव्यों की परीक्षा द्वितीयाऽध्याय में हो चुकी।
अब शेष रहे आत्मा और मन; इन में से उद्देशक्रमानुसार प्रथम आत्मा की
परीक्षा करेंगे । उस में प्रथम आत्मसिद्धि के लिये हेतु दिखलाने को भूमिका
बांधते हैं किः-
११७-प्रसिद्धा इन्द्रियाऽर्थाः ॥ १ ॥
( इन्द्रियार्थाः ) इन्द्रियों के विषय ( प्रसिद्धाः ) प्रसिद्ध हैं ॥
अर्थात् सभी जानते हैं कि नाक से गन्ध, जिह्वा से रस, आंख से रूप,
त्वचा से स्पर्श, और कान से शब्द सुनाई पड़ कर ज्ञान होता है ॥ १ ॥ तब-
११८-इन्द्रियार्थप्रसिद्धिरिन्द्रियार्थेभ्योऽर्थान्तरस्य हेतुः ॥ २ ॥
(इन्द्रि-द्धिः) इन्द्रियों के अर्थों की प्रसिद्धि (हेतुः) साधक है (इन्द्रियार्थेभ्यः)
इन्द्रियार्थों से ( अर्थान्तरस्य ) अन्य अर्थ का ॥
इन्द्रियार्थों को तो लोग जानते ही हैं, इसी से यह भी प्रमाणित होता
है कि कोई अन्य पदार्थ है जो नाक से सूंघ कर, जिह्वा से चाख कर, आंख
से देख कर, त्वचा से छूकर और कान से सुन कर इन विषयों का ग्रहण
करता है, वह आत्मा है ॥
यदि कहो कि इन्द्रियार्थों से भिन्न कोई पदार्थ होना तो चाहिये किन्तु
वह पदार्थ शरीर ही क्यों न मान लिया जाते ? तद्भिन्न आत्मा के मानने
की क्या आवश्यकता है ? तो उत्तरः-
११९-सोऽनपदेशः ॥ ३ ॥
( सः ) वह हेतु ( अनपदेश ) अहेतु है ॥
शरीर को ज्ञानाश्रय सिद्धकरनेवाला वह हेतु अहेतु वा हेत्वाभास होगा,
क्योंकि जो जिस के आश्रित हो वह उस का कार्य हो, यह नियम नहीं है ।
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