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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 160 में से

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सकता। करता है, इस से जाना जाता है कि शब्द अनित्य नहीं, नित्य=स्थिर है ॥
आगे उत्तर पक्ष करते हैं और तीनों पूर्वपक्षस्थ हेतु ओं का खण्डन करते हैंः-
११५-संदिग्धाः ॥ ३६ ॥
संदेह वाले हैं ॥
पूर्वपक्ष में दिये हुये तीनों हेतु संदिग्ध हैं, इस लिये उन से शब्द की
अनित्यता नहीं सिद्ध होती । देवदत्त ने यज्ञदत्त को गाना वा नाचना
सिखाया । जब यज्ञदत्त भी वही नाच नाचता है, जो देवदत्त ने स्वयं नाच
कर बताया था । इस में यह निश्चय नहीं होता कि देवदत्त के ही नृत्य को
यज्ञदत्त पुनः करता है, किन्तु यह भी तो होसक्ता है कि जिस प्रकार देव-
दत्त अपने नृत्य का स्वतन्त्र कर्त्ता है, उसी प्रकार एक उसी प्रकार के दूसरे
नृत्य का स्वतन्त्र कर्त्ता यज्ञदत्त हो । एक कुम्भकार ने एक घड़ा बनाया,
उसे देख कर दूसरे कुम्भकार ने दूसरा घड़ा बनाया, तब क्या यह कह सक्ते
हैं कि घट अनित्य नहीं, क्योंकि घट अनित्य होते तौ एक घट के समान दूसरा
घट न बनता । बस जिस प्रकार यह हेतु संदिग्ध वा अनैकान्तिक है वैसे ही
शब्द की नित्यता पर दिये हेतु भी संदिग्ध और अनैकान्तिक हैं। गुरु जिस
शब्द को बोलता है, शिष्य सुनता है, सुनकर जानता है, जान कर वैसा ही
एक दूसरा शब्द बोलता है, इसी प्रकार सामिधेनी ऋचाओं में प्रथमा और
अन्तिमा ऋचा का त्रिरुच्चारण क्या शतवार उच्चारण क्यों न हो, सब स्वतन्त्र
एक ही प्रकार उच्चरित शब्द एक नहीं होते किन्तु एकाकार अनेक होते हैं,
और अनित्य हैं ॥
११६-संति बहुत्वे संख्याभावः सामान्यतः ॥ ३७ ॥
(बहुत्वे) बहुतायत (सति) होने पर भी (संख्याभावः) संख्या का
होना (सामान्यतः) सामान्य से है ॥
यद्यपि शब्द के अनित्य होने से वर्णात्मक शब्द भी बहुत होने चाहियें,
न केवल पाणिनीय शिक्षा (त्रिषष्टिः) सूत्रानुसार ६३ ही वर्ण हों । परन्तु
सामान्य से संख्या (६३) होगई है अर्थात् ६३ से भिन्न अधिक वर्ण भी कोई
बोलता है तौ भी वे सामान्य से अर्थात् इन्ही तरेसठ ६३ के कुछ समान
होने से इन्हीं में गिन लिये जाते हैं। जो लोग ६३ न मानकर ३३ व्यञ्जन और