वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयाऽध्याय' २ आन्हिक ४३
शब्द कर्म भी नहीं है, क्योंकि आंख से नहीं दीख पड़ता । यदि कर्म
होता तो आंख से दीखता ॥
यदि कहो कि जैसे कर्म शीघ्र नष्ट हो जाता है, वैसे ही शब्द भी शीघ्र
नष्ट हो जाता है, तब शब्द को कर्म क्यों न मान लें ? तो उत्तरः-
१०४-गुणस्य सतोऽपवर्गः कर्मभिःसाधर्म्यम् ॥ २५ ॥
(गुणस्य) गुण (सतः) होते हुवे [शब्द] का (अपवर्गः) नाश
(कर्मभिः) कर्मों से (साधर्म्यम्) साधर्म्य है ॥
जब कि शब्द द्रव्य नहीं, कर्म नहीं, इन दोनों बातों को पूर्व दो सूत्रों
में कह चुके और परिशेष से शब्द का गुण होना सिद्ध है, तब केवल आशु
विनाशी होना मात्र शब्द के कर्मत्व को निश्चय नहीं कराता, केवल शीघ्र
विनाशीपना शब्द का, कर्मों से आंशिक साधर्म्य मात्र है। किन्तु यह नियम
तो नहीं कि जो जो शीघ्रनाशवान् हो, वह २ कर्म ही हो। क्योंकि संख्या,
ज्ञान, सुख, दुःख इत्यादि भी तो शीघ्र नष्ट हो जाते हैं, क्या इतने मात्र
साधर्म्य से वे कर्म हो जाते हैं ? जब नहीं, तो शीघ्रविनाशित्व मात्र साधर्म्य
से शब्द को भी कर्म नहीं कह सक्ते ॥ और
१०५-सतो लिङ्गाऽभावात् ॥ २६ ॥
(सतः) अविनाशी का (लिङ्गाऽभावात्) लिङ्ग न होने से [नित्य नहीं
मान सक्ते ] ॥
कोई लिङ्ग नहीं पाया जाता जिस से शब्द को अविनाशी वा नित्य
मान सकें ॥ तथा-
१०६-नित्यवैधर्म्यात् ॥ २७ ॥
(नि-र्म्यात्) नित्य वैधर्म्य से [शब्द नित्य नहीं ] ॥
नित्य पदार्थ के धर्म हैं कि वह उत्पन्न और नष्ट न हो, परन्तु शब्द
उत्पन्न और नष्ट भी होता है, इस लिये शब्द का नित्य पदार्थों से धर्म
नहीं मिलता किन्तु वैधर्म्य है, इस वैधर्म्य से शब्द अनित्य है ॥
१०७-अनित्यश्चाऽयं कारणतः ॥ २८ ॥
(अयं) यह शब्द (कारणतः) कारण से (च) भी (अनित्यः) अनित्य है ॥