वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽध्याय १५
(संयोगानां) संयोगों का (द्रव्यम्) द्रव्य [कार्य सामान्य होता है] ॥
संयोगों से कार्य द्रव्य बनते हैं। यह स्पष्ट ही है ॥
२८-रूपाणां रूपम् ॥ २८ ॥
(रूपाणां) रूपों का (रूपं) रूप [कार्य सामान्य है] ॥
इसी से यह भी समझ लेना चाहिये कि जिस प्रकार कारण रूपों का
कार्य सामान्य कार्य रूपों में है, इसी प्रकार रस, गन्ध, स्पर्श, स्नेह, सांसि-
द्धिक, द्रवत्व, एकत्व, पृथक्त्व, परिमाण, वेग, स्थितिस्यापक, और गुरुत्व;
इन सब कारणों का कार्य सामान्य अपने २ कार्य रसादि में है ॥ २८ ॥
यह कह कर कि गुणों का गुण एक कार्य सामान्य है, अब यह कहते हैं
कि गुणों का एक कर्म कार्य-सामान्य है । यथा-
२९-गुरुत्वप्रयत्नसंयोगानामुत्क्षेपणम् ॥ २९ ॥
(गुरु-नां) गुरुत्व, प्रयत्न और संयोग, इन का (उत्क्षेपणं) एक उत्क्षे-
पण नामक कर्म [कार्य सामान्य है] ॥
उत्क्षेपण=उछाल को कहते हैं, जो गुरुत्व= वज़न, प्रयत्न=हरकत और
संयोग से उत्पन्न होता है। यह स्पष्ट ही देखा जाता है ॥ २९ ॥
गुणों का कार्य कह कर अब कर्मों का कार्य कहते हैं:-
३०-संयोगविभागाश्च कर्मणाम् ॥ ३० ॥
(संयोगविभागाः) संयोग, विभाग (च) और वेग (कर्मणां) कर्मों का
[कार्य सामान्य हैं] ॥
च शब्द से आचार्य ने वेग का समुच्चय किया जान पड़ता है क्योंकि कर्म
से ही संयोग विभाग और वेग उत्पन्न होते हैं ॥ ३० ॥
यदि कहो कि जब संयोगविभागादिक ही कर्म का कार्य हैं, द्रव्य और
कर्म नहीं, तब यही क्यों न कह दिया कि “संयोग और विभाग तो कर्मों
के कार्य हैं, द्रव्य और कर्म नहीं”, तो उत्तर-
३१-कारणसामान्ये द्रव्यकर्मणां कर्माऽकारणमुक्तम् ॥ ३१॥
(कारणसामान्ये) कारण की समानता में (कर्म) कर्म को (द्रव्यकर्म-
णाम्) द्रव्यों और कर्मों का (अकारणम्) कारण न होना (उक्तम्) कहा है ॥