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सर्वकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २८ )

एक कलक और कामिनी, ये लम्बी तरवारि ।
ताले थे हरिमिलन को, बिचही लीने मारि ॥
नारि नसावैं तीन सुख, जेहि नर पसे होय ।
भक्ति-मुक्ति अरु ज्ञानमें, पैठ सके ना कोय ॥

एक बार व्यासजीने शुक्रदेवजीसे शादी करनेको कहा ।
व्यासजीने समझानेमें घाटा न रखा, पर शुक्रदेवजीने एक
न मानी । उन्होंने कहा—“पिता जी ! लोह और काठकी
बेड़ियोंसे चाहे कभी छुटकारा हो जाय ; पर खी-पुत्र प्रभुतिकी
मोहरूपी बेड़ियोंसे पुरुषका पीछा नहीं छूट सकता । है पिता,
गृहस्थाश्रम जेलखाना है ; इसमें ज़रा भी सुख नहीं । खीके
लिये पुरुषको संसारमें नीचे-से-नीचे काम करने पड़ते हैं ।
जिनके मुँह देखनेसे पाप लगता है, उनको खुशामदें करनी
पड़ती है ; इसवास्ते मैं खीके बन्धनमें नहीं पड़ना
चाहता ।”

छप्पय ।

फट्यो पुरानो चौर, ताहि खेंचत अरु फारत ।
छोटे-छोटे बाल, दुःख-ही-दुःख पुकारत ।
घरमाहीं नहि अब, नारिहु निर्दय याते ।
भई महा जड़रूप, करत सुखतों नहि बातें ।