वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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चित्त एकसा रहे ; तब योगसिद्धि हुई समझनी चाहिये ।
कबोरा दास कहते हैं :—
समदृष्टि सतगुरु करें, मेरा भरम निकार ।
जहाँ देखों तहाँ एक ही, साहबका दीदार ॥
समदृष्टि तब जानिये, शीतल समता होय ।
सब जीवनकी आत्मा, लखै एकसी सोय ॥
समदृष्टि सतगुरु किया, भरम किया सब दूर ।
दूजा कोई दीखे नहीं, राम रहा भरपूर ॥
यही अवस्था सर्वोत्तम अवस्था है । इसीमें परमानन्द है ।
इस अवस्थामें शोक और दुःख का नाम भी नहीं है ; पर यह
अवस्था उन्हींको प्राप्त होती है, जिन पर जगदीशकी कृपा
होती है या जिनके पूर्व जन्मके सख्ति पुण्यों का उदय
होता है ।
समदर्शी होने के उपाय ।
समदर्शिता ही परमानन्द की सीढ़ी है ।
चित्त की समता ही योग है । जब समान दृष्टि हो गई, तब
योगसिद्धिमें बाकी ही क्या रहा ? जब मनुष्य को इस बात का
ज्ञान हो जाता है, कि समस्त जगत् और जगत्के प्राणियों में
एक ही चेतन आत्मा है ; छोटे-बड़े, नीचे-ऊँच सभी शरीरों में
एक ही ब्रह्मका प्रकाश है ; तब उसकी नज़र में सभी स्रष्टा