सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 586, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 586

( ४६८ )

जो समीप आवै शरणाई ।
राखौं ताहि प्राणकी नाई ॥

गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं :—

कोटि विघ संकट विकट, कोटि शत्रु जो साथ ।
तुलसी बल नहीं कर सकै, जो सुदृष्टि रघुनाथ ॥
राखनहारा साइयाँ, मारि न सकिहै कोय ।
बाल न बँका कर सकै, जो जग बैरी होय ॥

बुढ़ापेमें तो जगदीशको याद करो ।

बुढ़ापा आ जाने पर भी, जो परलोक बनानेकी सुध नहीं करते, खी-पुत्रोंकी ममतामें पड़कर, घर-गृहस्थीके जञ्जाल में फँसकर, उग्र पूरी कर देते हैं, उनकी भयङ्कर हानि और निन्दा होती है । कहा है :—

मूर्खो द्विजातिः स्थविरो गृहस्थः ।
कामी दरिद्रो, धनवान् तपस्वी ॥
वेश्या कुरुपा, तृपतिः कदम्यः ।
लोके षडेतानि विडम्बितानि ॥

मूर्ख ब्राह्मण, बूढ़ा गृहस्थ, दरिद्री कामी, धनवान् तपस्वी,
कुरुपा वेश्या और स्वेच्छाचारी राजा—ये ६ अपना फ़ज़ीता
और लोक-निन्दा करानेवाले हैं ॥

जो बुढ़ापे तक भी, गर्भावस्थाका किया इज़्ज़त पूरा नहीं