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सर्वकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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पृष्ठ 568

( ४५२ )

सो आके बुढ़ापेने किया, हाथ ये अन्धेर ।
जो दौड़के मिलते थे, वो अब लेते हैं मुँह फेर ॥
सब चीज़को होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा ।
आशिकको तो अल्लाह, न दिखलाए बुढ़ापा ॥२॥
क्या यारो, उलट हाथ गया हमसे जमाना ।
जो शोख कि थे, अपनी निगाहोंके निशाना ॥
डेढ़ है कोई डालके, दादाका बहाना ।
हँस कर कोई कहता है, कहाँ जाते हो नाना ॥
सब चीज़को होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा ।
आशिकको तो अल्लाह, न दिखलाए बुढ़ापा ॥३॥
पूछें जिसे कहता है, वो क्या पूछे है बुढ़ा ।
आँवे तो ये गुल-शोर ; कहाँ आवे है बुढ़ा ॥
बैठ तो ये है धूम, कहाँ बैठ है बुढ़ा ॥
देखें जिसे वह कहता है, क्या देखे है बुढ़ा ॥
सब चीज़को होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा ।
आशिकको तो अल्लाह, न दिखलाए बुढ़ापा ॥४॥
वह जोश नहीं, जिसके कोई खौफ़से दहले ।
वह जोम नहीं, जिससे कोई बातको सहले ॥
जब फस डूए हाथ, थके पाँव भी पहिले ।
फिर जिसके जो कुछ शौक में आवे, सोई कहले ॥

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बमुझि जलहौन सरोवर को और भारै कमल-हीन तालाब को खाना रहे है ।

( पृष्ठ ४०० )