वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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आबे दरिया बहे तो बेहतर,
इन्हीं रवा रहे तो बेहतर ।
पानी न बहे तो उसमें दुर्गन्ध आये ।
खजूर न चले तो मोर्चा खाये ॥
गिरिधर कवि कहते हैं :—
कुण्डलिया ।
( १ )
बहता पानी निर्मिला, पड़ा गन्ध सो होय ।
त्यों साधू रमता भला, दाग न लागे कोय ॥
दाग न लागे कोय, जगतसे रहे अलहदा ।
राग-द्वेष युग त्रेत, न चितको करें बिच्छेदा ॥
कह “गिरिधर” कविराय, शीत उष्णादिक सहता ।
होय न कहूँ आसक्त, यथा गंगा-जल बहता ॥
( २ )
रहनेो सदा इकतको, पुनि भजनेो भगवन्त ।
कथन श्रवण अद्वैतको, यही मतो है सन्त ॥
यही मतो है सन्त, तत्वको चितवन करनेो ।
प्रत्यक् ब्रह्म अभिन्न, सदा उर अन्तर धरनेो ॥
कह “गिरिधर” कविराय, ब्रह्मन दुर्जनको सहनेो ।
तजके जन-समुदाय, देश निर्जनमें रहनेो ॥