वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 490, कुल 648 में से
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ले ले धरमका तोषा, मत भूल ऐ दिवाने ! ।
नेकी की खेती करले, क्यों पाप बो' रहा है ? ॥३॥
माता पिता वा भाई, होंगे न केई साथी ।
क्यों मोहरूपी बोम्मा, नाहक केा टो रहा है ? ॥४॥
किरती तेरी पुरानी, हिकमतसे पार करले ।
ऐ दिल ! अथाह जलमें, तू क्यों डुबो रहा है ? ॥५॥
भजन ( लावनी )
पड़ लोभ मोहके जालमें, नर आयू क्यों खोता है ॥ टेक ॥
यह जग जान रैनका सुपना, जिसकेा कहता अपना-अपना ।
भूल गया ईश्वरका जपना, फँसा हुआ धन-मालमें ।
क्या सुखकी नींद सोता है ? ॥ १ ॥
चले अकड़ बन छैल छबीला, अन्त समय सब हा जाय टीला ।
काम न आये कुटुम्ब-कबीला, भूला जिनके ख्यालमें ।
केई साथी नहीं होता है ॥ २ ॥
अब क्यों सिर धुनि-धुनि पछितावे, रदन करै और रौल मचावे ।
कुछ नहीं तेरी पार बसावे, चूका पहिली चालमें ।
क्या खड़ा-खड़ा रोता है ? ॥ ३ ॥
समझ सोच कर कदम उठाना, मुश्किल मनुषजनम है पाना ।
कहै "सुरारी" जो हो दाना, भ्रज हर को हर हाल में ।
क्यों पाप-बीज बोता है ? ॥ ४ ॥