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सर्वकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ३७४ )

भजन ( रागविहाग )

हे मन गुमानी ! चेत कर ; हरिको सुमिर, हरिको सुमिर ।
बीती यह जाती है उमर ; हरिको सुमिर, हरिको सुमिर ॥१॥
नारी नरककी खान है ; जिसपर जगत गलतान है ।
इसका मज़ा इस आन है ; हरिको सुमिर, हरिको सुमिर ॥२॥
सुत बन्धु माता और पिता ; कुनवा कबीला आशन्नों ।
सब सुखके साथी हैं तेरे ; हरिको सुमिर, हरिको सुमिर ॥३॥
दुनियां कहौ क्या माल है ; मायाका फैला जाल है ।
इसपर तू क्या खुशहाल है ; हरिको सुमिर, हरिको सुमिर ॥३॥
कहना मेरा ले मान तू, हरगिज़ न कर अभिमान तू ।
एक प्रसुको सौंचा जान तू ; हरिको सुमिर, हरिको सुमिर ॥५॥


भजन ।

क्या देख दिवाना हुआ रे ॥ टेक ॥

मादा बनी सारकी सूली, नारी नरकका कूआ रे ॥१॥
हाड़ चाम का बना पींजरा, तामें मनुखों सूआ रे ॥२॥
भाई बन्धु और कुटुम्ब वनेरा, तिनमें पच २ मूआ रे ॥३॥
कहत कबीर सुनो भाई साधो, हार चला जग जूआ रे ॥४॥