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सर्वकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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निकलनेकी चेष्टा करो । खूब खूबदार रहो ! इस जगत्के सभी सुख-भोग झूठे और प्राणीके पक्षमें अहितकर हैं । मि० आगा हथने थियेटरके गानेके तर्जमें क्या खूब कहा है :—

इस जालमें सब उलझाये, दुनिया है गोरखधन्वा ।
डाल रखा है सबने गलेमें, लोभ-मोहका फन्दा ॥
ये दुनियाँ हैं बुरका लड़ई; देखके जी ललचाये ।
ना खाये तौभी पढ़ताये, खाये तो पढ़ताये ॥
फिर भी सकल जगत है अन्ध ।
इस दुनियाके सुख भी झूठे, इसका प्यार भी झूठा ॥
सावधान हो ! इस ठगनीने बड़ों बड़ोंको लूटा ।
मूरख ! मत बन इसका बन्दा ॥

यह चोला परोपकार और ईश्वर-भजनके लिये
भिला है ।

—◇◇◇◇—

आप जब इस दुनियामें आनेके लिये माँ के गर्भमें थे,
तब आपने परमात्मासे प्रार्थना की थी, कि हे नाथ ! मुझे इस
नरक-कुण्डसे निकालिये ; मैं दुनियामें जाकर माया-मोहमें
न फँसकर, केवल आपको ही परिस्तिश और उपासना तथा
जगत्के दूसरे प्राणियोंका उपकार करूँगा ; पर यहाँ आकर