वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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अन्म लेने और मरनेका घोर कष्ट सहना होता है । उसे कभी-
सुख नहीं मिलता ; उसकी मोक्ष नहीं होती । इसीलिए कहा
है कि, जो लोग स्त्रीको रखते हैं, उनको बड़ी बुरी गति
होती है ।
सोरठ ।
तजि तरुणी सों नेह, बुद्धिबध्द सों नेह कर ।
नरक निवारत येह, वहे नरक ले जात है ॥६२॥
62. O wise men, restrain yourselves from the company of
women which gives only transitory pleasure, and associate with
the virtues of sympathy, benevolence and wisdom. In hell, their
fat breasts adorned with necklaces or beautiful waists ornamented
with tinkling waist-chains will not help you in any way.
प्राण्णावातान्निवृत्तिः परधनहरणे संयमः सत्यवाक्यं
कालेशक्या प्रदानं युवतिजनकथासूक्तभावः परेष्मा ॥
तृष्णाबोतोविभंगो गुरुषु च विनयः सर्वश्रुतासूक्तम्पा
सामान्यःसर्वशास्त्रेष्वनुपहतविधिःश्रेयसामेष पन्थाः ॥६३॥
किसी भी जीवकी हिंसा न करना, पराया माल न लुगाना,
सत्य बोलना, समय पर सामर्थ्यानुसार दान करना, परस्त्रियोंकी
तजि=छोड़ो । तरुणी=युवती, जवान औरत । सों=से । नेह=रुनेह,
प्रेम । बुद्धिबध्द=बुद्धिरूपी बहू । यहे=बुद्धिरूपी बहू । वहे=तरुणी,
वती । नरक निवारत...ले जात है=बुद्धि-बहू नरकसे बचाती है और
युवती और नरकमें ले जाती है ।