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सर्वकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २२५ )

उरग तुरग नारी रूपाति, नर नीचो हथियार ।
तुलसी परखत रहब नित, इनाहँ न पलटत बार ॥

सर्प, घोड़ा, खी, राजा, नाच पुरुष और हथियार—इनको
सदा परखते रहना चाहिये, इनसे कभी ग्राफ़िल न रहना
चाहिये, क्योंकि इन्हें पलटते देर नहीं लगती ।

हे मन ! यदि तुझे प्रीति ही करनी है, तो उठ, गङ्गा-किनारेके
चूड़ों के नीचे : चल बैठ और आशुतोष भगवान् चन्द्रशेखर—
शिवजीसे प्रीति कर । उनको प्रीति सच्ची और कल्याणकारी है ।

गोस्वामीजीने और भी कहा है:—

कै ममता कर रामपद, कै ममता कर हेल ।
“तुलसी” दो मैंहँ एक अब, खेल छाँड़ि छल खेल ॥
सम्मुख हवै रघुनाथके, देह सकल जग पीठि ।
तजै कैजुरी उरग कहँ, हेत अधिक अति दीठि ॥

या तो भगवान्के चरणोंमें ममता कर अथवा देहके सब
नातोंको त्यागकर उदासीन हो जा और कर्म ज्ञानादि साधन
करके मनको शुद्ध कर ले । जब तेरा मन शुद्ध हो जायगा, तब
भगवान्के चरणोंमें आप ही स्नेह हो जायगा । इन दोनों बातोंमें
से जो एक बात तुझे पसन्द हो, उसे छल छोड़कर दिलसे
कर ; एक खेल-खेल । सारांश यह, कि भगवान्में सहज
स्नेह कर । अगर तेरा मन प्रभुकी भक्तिमें नहीं जमता, तो
खी-पुत्र आदि संसारी भोगोंसे मन हटाकर, प्रभुकी भक्तिकी
चैष्टा कर ।

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