वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 298, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( २०१ )
इत्युपविकल्पजल्पमुखैः सम्भाष्यमाणं जनै-
र्न कुद्वाः पथि नैव तुष्टमनसो यान्ति स्वयं योगिनः ॥५६॥
यह चाशडाल है या ब्राह्मण है ? यह शुद्ध है या तपस्वी है ?
क्या यह तत्त्वविद् योगीश्वर है ?—लोगों द्वारा ऐसी अनेक प्रकार
की संशय और तर्कयुक्त बातें सुनकर भी, योगी लोग न नाराज़
होते हैं न खुश ; वे तो सावधान चित्त से अपनी राह-राह चले
जाते हैं ॥५६॥
योगिजन लोगोंकी बुरी-भली बातोंका खयाल नहीं करते ;
कोई कुछ भी क्यों न कहा करे । चाहे उन्हें कोई शुद्ध कहे
चाहे ब्राह्मण, चाहे भक्ती और चाहे तपस्वी ; चाहे कोई निन्दा
करे, चाहे स्तुति ; वे अच्छी बातसे प्रसन्न और बुरी बातसे
अप्रसन्न नहीं होते । सच्चे महात्मा हर्ष-शोक, दुःख-सुख और
मान-अपमान सबको समान समझते हैं ।
योगेश्वर कृष्णन “गीता”के दूसरे अध्यायमें कहा है—
दुःखेष्वनुद्विगमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥५६॥
जो दुःखके समय दुःखी नहीं होता ; जो राग, भय और
क्रोधसे रहित है, वह “स्थितप्रज्ञ” मुनि है ।
बुद्धिमानको किसी भी बातकी परवा न करनी चाहिये । हाथा
की तरह रहना चाहिये । हाथीके पीछे हजाराँ कुत्ते भूकते हैं,