वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 222, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( १३१ )
एकमात्र परमात्माका भजन करना चाहिये। कबीरदास कहते हैं—
यह तन काँचा कुम्भ है, माँहि किया रहवास ।
“कबिरा” नैन निहारिया, नहीं पलककी आस ॥
“कबिरा” जो दिन आज है, सो दिन नाही काल ।
चेत सके तो चेतिये, मीच परी है ख्याल ॥
“कबिरा” सुपने रैनके, उधरि आये नैन ।
जीव परा बहु लूटमें, जागूँ तो लेन न देन ॥
आजकाल कि पाँच दिन, जंगल होयगा बास ।
ऊपर-ऊपर हल फिरै, ढोर चरगे घास ॥
तुलसीदासजी कहते हैं—
“तुलसी” जगमें आइके, कर लीजे दो काम ।
देवको टुकड़ा भलों, लेवेको हरि-नाम ॥
“तुलसी” राम-सनेह कर, त्यागु सकल उपचार ।
जैसे घटत न अंक नौ, नौ के लिखत पहार ॥
तन=शरीर । काँचा कुम्भ=कच्चा घड़ा । माँहि किया रहवास=भीतर जीव रहता है । नैन निहारिया=आँखोंसे देखा । मीच=मौत । छपने रनके=रातके छपने । उधरि आये=खुल गये । आजकाल कि पाँच दिन=आज, कल अथवा पाँच दिन बाद । ढोर=गाय भैंस प्रभृति मवेशी ।
टुकड़ा=रोटोका टुकड़ा । रामसनेह कह=रामसे प्रेम कर । त्यागु सकल उपचार=सारे आंकट छोड़ । घटत न अंक नौ=नौका अंक नहीं घटता—