वैराग्य शतक

वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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( ६१ )
हाड़ मांस मज्जा मेद, चाममुँ लपेटि राखै ।
ठोर-ठोर रक्तके, भेड़ भगडार हैं ॥
मूत्रह पुरीष आत, एकमेक मिलि रहौं ।
और ही उदर माँहि, विविध विकार हैं ॥
सुन्दर कहत, नारी नखशिख निन्दा-रूप ।
ताहि जा सराहै, सो तो बड़ेई गँवार है ॥२॥
( ३ )
( राग सोरठ )
अनाड़ी मन ! नारी नरकका मूल ।
रंग रूप पर भया लुभाना,
क्यों मूल गया हरि नाम दिवाना ? ।
इस धन यौवनका नाहि ठिकाना,
दो दिनमें हो जाय घूल ॥१॥
कंचन भरे दो कलश बतावे,
ताहि पकड़ आनन्द मनावे ।
यह तो चमड़ेकी थैली हैं मूरख,
जिन पै रहो तू भूल ॥२॥
जा सुखको तू चन्दा कर माने,
थूक राल वामें लिपटाने ।
धिक धिक धिक ! तेरे या सुख पै,
मिथामें रहो तू भूल ॥३॥