उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 9, कुल 364 में से
संदर्भ में पढ़ें( iii )
६. ब्रह्मात्मैक्यज्ञान का फल ... .... २७-२९
७. आत्मज्ञ के लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं है ... .... ३०-४०
८. स्थूल-सूक्ष्म दोनों देहों से पृथक् ही आत्मा है ... .... ४१-५०
१५. नान्यदन्यत्प्रकरणम् (पृ० ९५-११६)
१. स्वभाव से ही शुद्ध आत्मा की साधनविशेष से शुद्धि बताने वालों के मतका खण्डन .... ... १-३
२. आत्मा का साक्षित्व ... ... ४ ६
३. वीतराग विद्वान् के लिये कर्मसंन्यास बताकर शुद्धात्मस्वरूप का अनुचिन्तन का प्रतिपादन ... ... ७-१८
४. ब्रह्मात्मैक्यज्ञान के लिये पदार्थविवेक के अनुष्ठान की आवश्यकता का प्रतिपादन ... ... १९-२०
५. अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा साक्षी और साक्ष्य का विचार करके अवस्थात्रय के विवेक
द्वारा उसके तुरीय साक्षी के अधिगम का प्रकार ... .... २१-२६
६. कार्य-कारणात्मक माया की उपाधि के कारण आत्मा में ज्ञातृत्व-कर्तृत्व-सर्वज्ञत्वादि व्यवहार .... .... २७-२८
७. आत्मा का निरुपाधिक स्वरूप, मन या वाणी से नहीं, वेदान्त से ही जाना जाता है ... ... २९-३२
८. तीनों अवस्थाओं के अभिमान को त्यागने का प्रकार .... ... ३३-३५
९. मुमुक्षु के लिये उसके कर्तव्य का उपदेश .... ... ३५-३९
१०. ज्ञेयत्व-अज्ञेयत्वादि के प्रतिभास की व्यवस्था एवं ब्रह्मात्मतत्त्व की स्वयम्प्रकाशता का प्रतिपादन ... ... ४०-५४
१६. पार्थिवप्रकरणम् (पृ० ११९-१४७)
१. स्थूल शरीर को ही आत्मा समझनेवालों के मत का निराकरण .... .... १
२. इन्द्रियों को ही आत्मा कहनेवालों के मत का खण्डन ... ... २-३
३. बुद्धि को ही आत्मा माननेवालों के मत का निरसन .... ... ४-१४
४. शून्य को ही आत्मा कहनेवाले बौद्धों के सिद्धान्त का खण्डन .... .... १५-२१
५. दिगम्बर जैनों के आत्मसिद्धान्त का खण्डन .... ... २२
६. शाक्यों (बौद्धों) के आत्मसिद्धान्त का खण्डन .... ... २३-२९
७. स्वकीय सिद्धान्त का सामञ्जस्य बताते हुए शून्यमत का निराकरण ... .... ३०-४४
८. सांख्यसम्मत पुरुष (आत्मा) की निर्गुणता के सिद्धान्त का खण्डन ... .... ४५-५०
९. वैशेषिकसम्मत प्रक्रिया में दोषप्रदर्शन ... ... ५१-५७
१०. बन्ध की अज्ञानात्मकता .... ... ५८-६१
११. मोक्ष का स्वरूप .... .... ६२-६७
१२. परपक्ष का निराकरण समाप्त करके स्व-मत का उपसंहार : .... ६८-७४
१७. सम्यङ्मतिप्रकरणम् (पृ० १४८-१८२)
१. गुरु-देवता नमस्कार .... .... १-३
२. आत्मलाभ ही परमलाभ है .... .... ४-६
३. ज्ञान से ही अज्ञाननाशलक्षण मोक्ष की प्राप्ति होती है, 'कर्म' से नहीं ... ... ७-८
४. सम्पूर्ण वेद, एकार्थज्ञानपरक होने से एकवाक्यरूप हैं ... ... ९-१०
५. दृश्यमान समस्त व्यवहार, वस्तुतः सत् नहीं है ... ... ११-२१
६. यम-नियम-यज्ञ और तप के द्वारा चित्त का शोधन .... .... २२-२६
७. आत्मा का मायाकल्पित बहुत्व ... .... २७-३२
८. परमात्मा में फल की अव्याप्यता (अविषयता) रहने पर भी वृत्तिव्याप्यता (वृत्ति-
विषयता) और नित्यता आदि के रहने का प्रतिपादन ... ... ३३-४३