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सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 208 में से

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पृष्ठ 202

174 त्रिशतिका
त्र्यस्त्र-फल = त्रिभुज-क्षेत्रफल
त्रिभुजस्य फलं शरीरं समदलकोटी भुजार्धसंवर्गः-आर्यभटीय, गणितपाद 1.6
(i) चतुरस्रे त्र्यस्रे वा क्षेत्रे कुदलं च लम्बहतम्-त्रिशतिका सूत्र 43, पृ. 115
(ii) भुजयुतिदलं चतुर्धा भुजहीनं तद् वधात् पदं गणितम्-त्रिशतिका सूत्र 43,
पृ. 115
I से तुल. लम्बगुणं भूम्यर्ध स्पष्टं त्रिभुजे फलं भवति-लीलावती, क्षेत्र
व्यवहार, श्लोक 18
(ii) से तुल. ⇒ सर्वदोर्युतिदलं चतुःस्थितं बाहुभिर्विरहितं च तद्वधात्।
मूलमस्फुटफलं चतुर्भुजे स्पष्टमेवमुदितं त्रिबाहुके।। -लीलावती, क्षेत्रव्यवहार,
श्लोक 19, पृ. 217
परिधि = वृत्त-परिणाह (आर्यभटीय) (circumference)
परिधान भी- त्रिशतिका उदा. 102, पृ. 154
चतुरधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्।
अयुतद्वय-विष्कम्भस्यासन्नो वृत्त-परिणाहः।।-आर्यभटीय, गणितपाद श्लोक
1.10
वृत्तव्यासस्य कृतेर्मूलं परिधिर्भवति दशगुणायाः। -त्रिशतिका सूत्र 45, पृ.
123
त्रिशतिका से तुल. - वृत्तक्षेत्रव्यासो दशपदगुणितो भवेत् परिक्षेपः (परिधिः)
-गणितसार संग्रह, क्षेत्र गणितव्यवहार, श्लोक 60
आर्यभटीय से तुल. - द्वाविंशतिघ्ने विहृतेऽथ शैलैः स्थूलोऽथवा स्याद्
व्यवहारयोग्यः।
-लीलावती, क्षेत्रव्यवहार, श्लोक 40, पृ. 276
भुज = आधार (base)
कर्णकृतेः कोटिकृतिं विशोध्य मूलं भुजः - ब्रा.स्फु.सि. 12.24
भुजकोट्योः कृतिहीनात् पृथक्-पृथक् कर्णवर्गंतो मूले।
कोटिभुजौ - त्रिशतिका सूत्र 51, पृ. 131
कोटिवर्गोनायाः कर्णकृतेर्मूलं भुजः। उसी श्लोक पर त्रिशतिका व्याख्या पृ.
132
कोटिश्रुतिकृत्योरन्तरात् पदं बाहुः - लीलावती, क्षेत्रव्यवहार, श्लोक 2, पृ.