त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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अप्यसत्यं मयोक्तं यत्तद्विमर्शय सद्धिया ।
लोके हि कुशलो मर्त्यः सर्वव्यवहृतौ ननु ॥ १८ ॥
परीक्ष्यैकांशतः सर्वमभिजानाति संस्थितिम् ।
निदर्शनं प्रदास्यामि तुभ्यमत्र समीक्ष्य ॥ १९ ॥
यः पुरा विषयः सर्वो बभूवाभीष्टसाधनम् ।
चिरान्मद्वचनात् सोऽद्य कुतो न सुखसाधनम् ॥ २० ॥
स एवाद्य साधयति सुखमन्येषु वै कुतः ।
एतन्निदर्शनेनैव स्वमतं वेत्तुमर्हसि ॥ २१ ॥
शृणु राजन् यदि वरं ऋज्व्या निर्मलया धिया ।
अनाश्वासो रिपुलोको भवेदाप्तोक्तिषु स्थिरः ॥ २२ ॥
श्रद्धा माता प्रपन्नं स वत्सलेव सुतं सदा ।
रक्षति प्रौढभीतिभ्यः सर्वथा नहि संशयः ॥ २३ ॥
यदि मेरी कही हुई बात झूठी भी हो तो भी आप अपनी सूक्ष्म
बुद्धिसे इसपर विचार करें । लोकमें मनुष्य तो सभी प्रकारके व्यवहारमें
कुशल होता है ॥ १८ ॥
वह केवल एक अंशकी ही परीक्षा करके सारी परिस्थितिको जान
लेता है। विचार करनेके लिये आपको मैं एक अनुभवका स्मरण
कराती हूँ ॥ १९ ॥
पहले चिरकालसे जो विषय आपके लिये सुखके साधन बने हुए
थे, मेरी बातें सुनकर अब वे क्यों सुखदायक नहीं रहे ? ॥ २० ॥
वे ही इस समय भी दूसरोंको सुख क्यों देते हैं ? इतने अनुभवसे
ही आप मेरे कथनके विषयमें अपना निर्णय समझ सकते हैं ॥ २१ ॥
राजन् ! जो श्रेष्ठ बचन है उसे सरल भावसे सुनिये । विश्वसनीय
पुरुषोंके वचनोंमें विश्वास न करना—यह अपना पक्का शत्रु ही है॥ २२ ॥
श्रद्धा साक्षात् माता है। जो उसकी शरण लेता है वह स्नेहमयी
अपने बच्चेकी तरह सर्वदा उसकी बड़ीसे बड़ी आपत्तियोंसे रक्षा
करती है—इसमें सन्देह नहीं ॥ २३ ॥