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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

षष्ठोऽध्यायः । ८१
तथा तव वचो मन्ये सर्वथाऽसङ्गतं ननु ।
श्रुत्वैवं प्रियवाक्यं सा चतुरा प्राह तं पुनः ॥ १२ ॥
नाथ प्रोक्तं मया यत्ते तत् कथं स्यादपार्थकम् ।
न मादृशानां वचनं निरालम्बं क्वचिद्भवेत् ॥ १३ ॥
मृषा हि तपसां हन्त्री सत्यशीलेषु सा कुतः ।
तपस्विनां कुले कस्माच्छ्वित्रे सौन्दर्यवद्भवेत् ॥ १४ ॥
यो योजयति जिज्ञासुमन्यार्थेन ह्यसत्यतः ।
तस्य नोर्ध्वं न चाधस्ताल्लोकेऽस्ति सुखसाधनम् ॥ १५ ॥
शृणु राजसुतोक्तिं मे लोके तैमिरिकः क्वचित् ।
समदृष्टिं नैति शीघ्रमञ्जनानां वचोगणैः ॥ १६ ॥
असत्यमेव जानाति हितप्रोक्तं च मूढधीः ।
तत्त्वां प्रियाहं जिज्ञासुमसतैर्योजयामि किम् ॥ १७ ॥
मैं तो तुम्हारे कथनको इसी प्रकार सर्वथा असंगत मानता हूँ।"
प्रियतमकी यह बात सुनकर उस चतुर नारीने उससे पुनः कहा ॥ १२ ॥
"नाथ ! मैंने आपसे जो कुछ कहा है वह असंगत कैसे हो सकता
है। मुझ-जैसों का भाषण निराधार कभी नहीं हो सकता ॥ १३ ॥
मिथ्या भाषण तो तपस्याको नष्ट करनेवाला है। तपस्वियोंके
कुलमें उत्पन्न हुए सत्यनिष्ठ व्यक्तियोंमें वह कोढ़में सुन्दरताके समान
कैसे रह सकता है ? ॥ १४ ॥
जो पुरुष असत्य बोलकर किसी जिज्ञासुको दूसरे विषयोंमें लगा
देता है उसे ऊपर और नीचेके किसी लोकमें सुखकी उपलब्धि नहीं
होती ॥ १५ ॥
राजकुमार ! मेरी बातपर ध्यान दो। देखो, लोकमें जिसे तिमिर
रोग हो गया हो उसे अञ्जनवाचक शब्दोंको उच्चारण करनेसे ही शुद्ध
दृष्टि नहीं मिल जाती ॥ १६ ॥
मूढबुद्धि पुरुष तो हितकी बातोंको भी असत्य ही समझते हैं।
भला, आपकी प्रिया होकर भी आप जिज्ञासुको मैं असत्यके साथ कैसे
जोड़ सकती हूँ ॥ १७ ॥
६ त्रि० ज्ञा०