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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 67

चतुर्थोऽध्यायः । ५३
चितिश्चेत्यं चितिरहं चितिः सर्वं चराचरम् ।
यतः सर्वं चितिमनु भाति सा तु स्वतन्त्रतः ॥ १०० ॥
अतिश्रिति जनाः सर्वे भासिनीं सर्वसंश्रयाम् ।
भजध्वं भ्रान्तिमुत्सृज्य चितिमात्रसुदृष्टयः ॥ १०१ ॥
कदाचिदेवं कीराणां श्रुत्वा वाक्यं महोदयम् ।
ब्राह्मणा वामदेवाद्या नामाचख्युः पुरस्य तु ॥ १०२ ॥
यतोऽत्र विद्यां तिर्यञ्चोऽप्याहुस्तस्मादिदं पुरम् ।
प्रसिद्धविद्यानगरमिति नाम्ना प्रसिद्धयतु ॥ १०३ ॥
तदद्यापि च तेनैव नाम्ना तन्नगरं स्थितम् ।
राम तस्मात्तु सत्सङ्गो मूलं सर्वशुभोदये ॥ १०४ ॥
सङ्गेन हेमलेखायाः सर्वे विद्याविदोऽभवन् ।
तस्मात् सङ्गः परं मूलं राम जानीहि श्रेयसः ॥ १०५ ॥
इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे हेमचूड़ोपाख्याने
सत्सङ्गफलं चतुर्थोऽध्यायः ॥
चिति (चिन्मात्र) ही चेत्य है, चिति ही मैं हूँ और चिति ही
सारा चराचर है, क्योंकि इन सबका भान चितिसे ही होता है और
चिति स्वयंप्रकाश है ॥ १०० ॥
इसलिये हे लोगो ! भ्रान्ति को त्यागकर केवल चितिपर ही दृष्टि
रखते हुए सबको प्रकाशित करनेवाली और सभीकी आश्रयभूत चिति-
का ही भजन करो" ॥ १०१ ॥
किसी दिन वामदेवादि ब्रह्मज्ञ महात्माओंने तोतोंके ये अत्यन्त
सारगर्भित वचन सुनकर उस नगरका नाम बदल दिया ॥ १०२ ॥
[वे बोले—] क्योंकि यहाँ पक्षी भी विद्या (ब्रह्मज्ञान) का प्रतिपादन
करते हैं, इसलिये अब यह नगर 'विद्यानगर' नामसे प्रसिद्ध होगा ॥
अतः आज भी वह नगर उसी नामसे विख्यात है। इसलिये
परशुराम ! सत्संग ही सब प्रकारके मंगलका आविर्भाव होनेमें मूल
कारण है ॥ १०४ ॥
एक हेमलेखाके संगसे ही वहाँ सब लोग ज्ञानवान हो गये । अतः
परशुराम ! निश्चय जानो, कल्याणका वास्तविक मूल सत्संग ही है ॥
चतुर्थ अध्याय समाप्त ।