त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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केवलां चितिमात्मस्थां त्रिपुरामात्मरूपिणीम् ।
बुद्ध्वाऽभवद्विमुक्तात्मा स्वात्मभूताखिलेक्षणः ॥ ९४ ॥
जीवन्मुक्तः समभवत् ततस्तस्यानुजोऽपि हि ।
मणिचूडोऽविदद्भ्रातुर्मुक्ताचूडोऽपि पुत्रतः ॥ ९५ ॥
मुक्ताचूडप्रिया चापि स्नुषया ज्ञानमासदत् ।
मन्त्रिणश्चापि पौराश्च बभूवुर्ज्ञानशालिनः ॥ ९६ ॥
न तत्र नगरे कश्चिदविद्वान् समजायत ।
आसीद् ब्रह्मपुरप्रख्यं शान्तसंसृतिवासनम् ॥ ९७ ॥
विशालनगरं तच्च जगत्यत्युत्तमं बभौ ।
यत्र कीराः शारिकाश्च पञ्जरस्थाः पठन्ति वै ॥ ९८ ॥
चितिरूपं स्वमात्मानं भजध्वं चेत्यवर्जितम् ।
नास्ति चेत्यं चितेरन्यद्दर्पणे प्रतिबिम्बवत् ॥ ९९ ॥
पदको जान लिया, जो विशुद्ध चिन्मात्रा आत्मस्वरूपिणी श्रीत्रिपुरा ही
हैं और सबके अन्तःकरणमें स्थित है। उसे जानकर वह मुक्तस्वरूप
(जीवन्मुक्त) हो गया और सबको अपने आत्मस्वरूपसे ही देखने
लगा ॥ ६३ उ०-६४ ॥
फिर उसका छोटा भाई मणिचूड़ भी अपने भाईसे ज्ञान प्राप्त
करके जीवन्मुक्त हो गया और राजा मुक्ताचूड़ने भी अपने पुत्रसे ही
ज्ञान प्राप्त किया ॥ ६५ ॥
मुक्ताचूड़की रानीने अपनी पुत्रवधू (हेमलेखा) से ज्ञान प्राप्त किया।
इसी प्रकार सब मन्त्री और पुरवासी भी ज्ञानसम्पन्न हो गये ॥ ६६ ॥
उस नगरमें कोई भी अज्ञानी नहीं रहा। सभीकी सांसारिक
वासनाएँ निवृत्त हो गयीं। इस प्रकार वह नगर ब्रह्मपुरीके समान
जान पड़ता था ॥ ६७ ॥
वह विशाल नगर संसारमें अत्यन्त उत्कृष्ट हो गया। वहाँ पिंजड़ोंमें
बन्द तोते और मैना भी इस प्रकार पढ़ते रहते थे— ॥ ६८ ॥
“चेत्य (दृश्य) पदार्थोंसे रहित जो चिन्मात्र अपना आत्मा है,
उसका भजन करो। दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान चेत्य पदार्थ
चिन्मात्रसे भिन्न नहीं है ॥ ६६ ॥