त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशतितमोऽध्यायः । ३४५
निर्भयः सङ्गरहितो निर्दुःखो जितमानसः ।
ज्ञातज्ञेयस्त्वदीनात्मा शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ १०३ ॥
दुर्लक्ष्यः स्यात् को हि लोके विदेहो दृश्यते च कः ।
निष्क्रियस्य क्रिया का स्याद्वैतन्नृपनन्दन ॥ १०४ ॥
जीवन्मुक्तो हि दुर्लक्ष्यो विदेहो देहवानपि ।
तत्क्रिया निष्क्रियस्योक्ता शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ १०५ ॥
किमस्ति किं नास्ति लोके कोऽत्यन्तासम्भवो भवेत् ।
एतावदुक्त्वा नृपते मोचय द्रुतमग्रजम् ॥ १०६ ॥
दृगस्ति नास्ति वै दृश्यं व्यवहारो ह्यसम्भवी ।
उक्तमेतद्ब्रह्मरक्षो मुञ्च मद्भ्रातरं द्रुतम् ॥ १०७ ॥
श्रुत्वैतदथ सन्तुष्टो मुमोच ब्रह्मराक्षसः ।
रुक्माङ्गदं ततः पश्चादभवद्ब्राह्मणो हि सः ॥ १०८ ॥
उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, जिसकी किसीमें आसक्ति नहीं है, वह
निर्भय रहता है, जिसका मनपर अधिकार है वह दुःखहीन रहता है
और जिसने जाननेयोग्य वस्तुको जान लिया है उसमें दीनता नहीं
रहती ॥ १०३ ॥
प्र०—राजकुमार ! यह बताओ कि लोकमें जिसकी पहचान अत्यन्त
कठिन है वह कौन है ? विदेह होकर भी दिखायी कौन देता है और
निष्क्रियकी क्रिया क्या है ? ॥ १०४ ॥
उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, जीवन्मुक्तकी पहचान अत्यन्त कठिन
है, वही देहवान् होकर भी विदेह है और उसकी क्रिया ही निष्क्रियकी
क्रिया कही जाती है ॥ १०५ ॥
प्र०—लोकमें कौन-सी वस्तु है और कौन-सी नहीं है ? तथा
अत्यन्त असम्भव क्या है ? राजन् ! बस, इतना बतला देनेपर मैं तुरन्त
तुम्हारे भाईको छोड़ दूँगा ॥ १०६ ॥
उ०—ब्रह्मराक्षस ! द्रष्टा चेतन है और दृश्य नहीं है तथा व्यवहार
असम्भव है। इस प्रकार मैंने तुम्हारे इस प्रश्नका भी उत्तर दे दिया
अब तुरन्त मेरे भाईको छोड़ दो ॥ १०७ ॥
यह सब सुनकर ब्रह्मराक्षस बड़ा प्रसन्न हुआ और उसने रुक्मा-
ङ्गदको छोड़ दिया। उसके पश्चात् वह भी ब्राह्मण ही हो गया ॥ १०८ ॥