त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
पृष्ठ 358, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ें३४४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
तत्र वा किं निदानं स्याद्वदैतन्नृपनन्दन ॥ ९६ ॥
देवतानुग्रहात् सर्वं भक्त्या सा हि समाप्यते ।
निदानं सत्सङ्ग एव शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ९७ ॥
का देवता च सम्प्रोक्ता का च सा भक्तिरुच्यते ।
सन्तश्च कीदृशाः प्रोक्ता वदैतन्नृपनन्दन ॥ ९८ ॥
देवता स्याज्जगद्धात्री भक्तिस्तत्परतोच्यते ।
सन्तः शान्ता दयावन्तः शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ ९९ ॥
सदा बिभेति को लोके सदा दुःखपरोऽपि कः ।
सदा दैन्ययुतः को वा वदैतन्नृपनन्दन ॥ १०० ॥
रू धनी सदा भीतो दुःखी बहुकुटुम्बवान् ।
आशाग्रस्तः सदा दीनः शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ॥ १०१ ॥
निर्भयः को भवेल्लोके निर्दुःखश्चापि को भवेत् ।
अदीनः सर्वदा कः स्याद्वदैतन्नृपनन्दन ॥ १०२ ॥
साधन भी किस प्रकार प्राप्त होंगे तथा उसका भी मूल कारण
क्या है ॥ ९६ ॥
उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, ये सब भगवत्कृपासे हो सकते हैं, भग-
वत्कृपा भक्तिसे प्राप्त होती है और उसका भी मूल सत्संग है ॥ ९७ ॥
प्र०—राजकुमार ! बताओ, भगवान् किसे कहते हैं ? भक्ति क्या
कही जाती है और संत किन लोगोंको कहा जाता है ? ॥ ९८ ॥
उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, जो जगत्को धारण करनेवाला है वह
भगवान् है । उन्हींमें मन लगा देना भक्ति है तथा शान्त और दयावान्
पुरुष सन्त होते हैं ॥ ९९ ॥
प्र०—राजकुमार ! यह बताओ कि संसारमें सर्वदा कौन डरता
रहता है ? कौन दुःखमें डूबा रहता है ? और कौन दीनतामें फँसा
हुआ है ? ॥ १०० ॥
उ०—ब्रह्मराक्षस ! सुन, जो बहुत अधिक धनी होता है वह सदा
डरता रहता है, अधिक कुटुम्बवाला दुःखी रहता है और आशाओंमें
फँसा हुआ सदा दीन रहता है ॥ १०१ ॥
प्र०—राजकुमार ! यह बताओ, लोकमें निर्भय कौन हो सकता
है, दुःखहीन कौन है और सर्वदा दैन्यशून्य कौन रहता है ? ॥ १०२ ॥