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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 337

विंशोऽध्यायः । ३२३
तत्र मद्भक्तियुक्तस्तु साधकः सर्वपूजितः ।
सिद्धिरात्मव्यवस्थितिर्देहानात्मत्वभावना ॥ १०४ ॥
आत्मत्वभावनं नूनं शरीरादिषु संस्थितम् ।
तदभावनमात्रन्तु सिद्धिमौढ्यविवर्जितम् ॥ १०५ ॥
आत्मा व्यवसितः सर्वैरपि नो केवलात्मना ।
अतएव तु सम्प्राप्ता महानर्थपरम्परा ॥ १०६ ॥
तस्मात् केवलचिन्मात्रं यद्देहाद्यवभासकम् ।
तन्मात्रात्मव्यवस्थितिः सर्वसंशयनाशिनी ॥ १०७ ॥
सिद्धिरित्युच्यते प्राज्ञैर्नान्तः सिद्धिरनन्तरा ।
सिद्धयः खेचरत्वाद्या अणिमाद्यास्तथैव च ॥ १०८ ॥
आत्मविज्ञानसिद्धेस्तु कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।
ताः सर्वास्तु परिच्छिन्नाः सिद्धयो देशकालतः ॥ १०९ ॥
इयं स्यादपरिच्छिन्ना स्वात्मविद्या शिवात्मिका ।
जो साधक मेरी भक्तिसे युक्त होता है वह तो सभी का आदरणीय
होता है ॥ १०३-१०४ पू० ॥
देहमें अनात्मत्वकी भावना और आत्मामें स्थिति—इसका नाम
ही सिद्धि है । शरीरादिमें जो आत्मत्व-भावना हो रही है उसका अभाव
हो जाना ही अज्ञानसे रहित सिद्धि है ॥ १०४ उ०-१०५ ॥
सभी लोगोंसे आत्माका शुद्धरूपसे निश्चय किया हुआ नहीं है ।
इसीसे यह जन्म-मरणरूप महान् अनर्थ-परम्परा प्राप्त हुई है ॥ १०६ ॥
अतः जो शुद्ध चिन्मात्र देहादि दृश्यवर्गोंको प्रकाशित करने-
वाला है केवल तद्रूपसे ही स्थित रहना—इस सम्पूर्ण संशयों-
को नष्ट कर देनेवाली स्थितिको ही विज्ञजनोंने सिद्धि कहा है ।
इससे भिन्न आकाशगमनादि और अणिमादि सिद्धियाँ वास्तविक सिद्धि
नहीं हैं ॥ १०७-१०८ ॥
वे सब सिद्धियाँ तो देश और कालसे परिच्छिन्न हैं । अतः वे आत्म-
ज्ञानरूपा सिद्धिके तो सोलहवें अंशके बराबर भी नहीं हैं ॥ १०६ ॥
यह शिवस्वरूपा आत्मविद्या तो अपरिच्छिन्न है । वे सब तो