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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 336

३२२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
तज्जाड्यं हि महान् दोषः पुरुषार्थविनाशनः ॥ ९७ ॥
तत्रात्मदेवतासेवामृते नान्यद्धि कारणम् ।
सेवायास्तारतम्येन जाड्यं तस्य हराम्यहम् ॥ ९८ ॥
जाड्याल्पानल्पभावेन सद्यो वा परजन्मनि ।
भवेत्तस्य फलप्राप्तिर्जाड्यसंयुक्तचेतसः ॥ ९९ ॥
सर्वसाधनसम्पत्तिर्ममैव प्रणिधानतः ।
उपयाति च यो भक्त्या सर्वदा मामकैटवात् ॥ १०० ॥
स साधनप्रत्यनीकं विधूयाशु कृती भवेत् ।
यस्तु मामीश्वरीं सर्वबुद्धिप्रसरकारिणीम् ॥ १०१ ॥
अनादृत्य साधनैकपरः स्यान्मूढभावतः ।
पदे पदे विहन्येत फलं प्राप्येत वा न वा ॥ १०२ ॥
तस्मात्तु ऋषयो मुख्यं तात्पर्यं साधनं भवेत् ।
एवं तात्पर्यवानेव साधकः परमः स्मृतः ॥ १०३ ॥

बैठती वह जडतारूप महान् दोष सभी पुरुषार्थोंको व्यर्थ कर देने-
वाला है ॥ ९७ ॥
उसकी निवृत्तिका उपाय तो परमात्मदेवकी उपासनाके सिवा
और कोई नहीं है। साधककी उपासनाकी न्यूनाधिकताके अनुसार
मैं उसकी जडता दूर कर देती हूँ ॥ ९८ ॥
उस जडचित्तवाले साधकको उसकी जडताकी न्यूनता या
अधिकताके अनुसार उसी अथवा अगले जन्ममें फलकी प्राप्ति हो
जाती है ॥ ९९ ॥
सब प्रकारके साधनोंकी पूर्णता मेरी उपासनासे ही होती है। जो
सर्वदा निश्छल भावसे भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करता है वह साध-
नके सभी विघ्नोंको पार करके कृतकृत्य हो जाता है ॥१००-१०१ पू०॥
जो सभीकी बुद्धियोंको प्रवृत्त करनेवाली मुझ भगवतीका अनादर
करके मूढ चित्तसे केवल साधनमें लगा रहता है वह पद-पदमें
ठोकर खाता है और उसे फल की प्राप्ति हो भी सकती है और नहीं
भी ॥ १०१ उ०-१०२ ॥
इसलिये ऋषियो ! मुख्य साधन तो तत्परता ही है। इस प्रकार
जो तत्परता-सम्पन्न है वही श्रेष्ठ साधक माना जाता है। उनमें भी