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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 331

विंशोऽध्यायः । ३१७
सान्ते भयं सर्वथैवाभयं तस्मात् कुतो भवेत् ॥ ६६ ॥
संयोगो विप्रयोगान्तः सर्वथैव विभावितः ।
फलयोगोऽपि तस्माद्धि विनश्येदिति निश्चयः ॥ ६७ ॥
यावदन्यत् फलं प्रोक्तं भयं तावत्प्रकीर्तितम् ।
तदेवाभयरूपन्तु फलं सर्वै प्रचक्षते ॥ ६८ ॥
यदात्मनोऽन्यदेव फलं मोक्षः प्रकीर्तितः ।
ज्ञाता ज्ञानं ज्ञेयमपि फलं चैकं यदा भवेत् ॥ ६९ ॥
तदा हि परमो मोक्षः सर्वभीतिविवर्जितः ।
ज्ञानं विकल्पसङ्कल्पहानं मौढ्यविवर्जितम् ॥ ७० ॥
ज्ञातुः स्वच्छात्मरूपं तदादावनुपलक्षितम् ।
उपदेशक एवातो गुरुः शास्त्रं च नेतरत् ॥ ७१ ॥
एतदेव हि विज्ञेयस्वरूपमभिधीयते ।
ज्ञातृज्ञानज्ञेयगतो यावद्भेदोऽवभासते ॥ ७२ ॥
लोकमें ऐसा अनेकों बार देखा गया है। नाशवान्में तो सब प्रकार
भय रहता ही है, इसलिये उसे पाकर कोई निर्भय कैसे हो सकता
है ? ॥ ६६ ॥
संयोग तो सब प्रकार वियोगमें समाप्त होनेवाला ही देखा गया
है। इसलिये यह निश्चय है कि किसी अन्य फलका संयोग भी
अन्तमें नष्ट होगा ही ॥ ६७ ॥
अतः जबतक आत्मासे भिन्न कोई और फल रहता है तबतक
तो भय कहा ही है। सभी ने अभयरूप फल तो वही बतलाया है
जिसे आत्मासे अभिन्न मोक्षरूप फल कहते हैं; जब कि ज्ञाता, ज्ञान,
ज्ञेय और फल भी एकरूप हो जाते हैं ॥ ६८-६९ ॥
तभी सब प्रकारके भयसे शून्य परम मोक्ष प्राप्त होता है
तथा सम्पूर्ण सङ्कल्प-विकल्पों की निवृत्तिपूर्वक अज्ञानशून्य ज्ञानका
उदय भी ॥ ७० ॥
ज्ञाताको अपना यह शुद्ध स्वरूप पहले मालूम नहीं होता। अतः
गुरु और शास्त्र ही उसका उपदेश करनेवाले हैं, कोई अन्य नहीं ॥ ७१ ॥
यही विज्ञेयका स्वरूप भी कहा जाता है। जबतक ज्ञाता, ज्ञान