त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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सर्वविज्ञानात्मरूपं यद्विज्ञानं भवेत् खलु ।
तदेवाऽद्वैतविज्ञानं परमं तापसोत्तमाः ॥ ६० ॥
जाते यादृशविज्ञाने संशयाश्चिरसम्भृताः ।
वायुनेवाभ्रजालानि विलीयन्ते परं हि तत् ॥ ६१ ॥
कामादिवासनाः सर्वा यस्मिन् सन्ति न किञ्चन ।
स्युर्भग्नदंष्ट्राहिरिव तद्विज्ञानं परं स्मृतम् ॥ ६२ ॥
विज्ञानस्य फलं सर्वदुःखानां विलयो भवेत् ।
अत्यन्ताभयसंप्राप्तिर्मोक्ष इत्युच्यते फलम् ॥ ६३ ॥
भयं द्वितीयसङ्कल्पादद्वैते विदिते दृढम् ।
कुतः स्याद् द्वैतसङ्कल्पस्तमः सूर्योदये यथा ॥ ६४ ॥
ऋषयो न भयं क्वापि द्वैतसङ्कल्पवर्जने ।
अतो यत् फलमन्यत् स्यात्तद्भयं सर्वथा भवेत् ॥ ६५ ॥
अन्तवत्तु द्वितीयं स्याद् भूयो लोके समीक्षणात् ।
श्रेष्ठ तपस्वियो ! जिस विज्ञानके द्वारा घट-पटादि सम्पूर्ण विज्ञान
आत्मस्वरूप हो जाते हैं वही वास्तवमें परम अद्वैतविज्ञान है ॥ ६० ॥
जिस प्रकारका विज्ञान उत्पन्न होनेपर चिरकालसे पोषित सारे संशय
वायुसे मेघमालाके समान लीन हो जाते हैं वही परविज्ञान है ॥ ६१ ॥
जिसके होनेपर कामादि सम्पूर्ण वासनाएँ कुछ भी नहीं रहतीं-
रहती भी हैं तो दाँत तोड़े हुए सर्पके समान व्यर्थ हो जाती हैं, वही
विज्ञान पर माना गया है ॥ ६२ ॥
इस विज्ञानका फल सम्पूर्ण दुःखोंकी निवृत्ति और पूर्ण निर्भयताकी
प्राप्ति है। यह मोक्ष ही उसका फल कहा जाता है ॥ ६३ ॥
भय तो किसी दूसरेका संकल्प होनेपर होता है। और दृढ
अद्वैतज्ञान होनेपर द्वैतका संकल्प हो कैसे सकता है ? जैसे सूर्योदय
होनेपर नहीं हो सकता ॥ ६४ ॥
ऋषियो ! द्वैतका संकल्प छूट जानेपर फिर कहीं भय नहीं रहता।
इसलिये जो फल आत्मस्वरूपसे भिन्न होगा वह तो सब प्रकार भय
रूप ही होगा ॥ ६५ ॥
अपनेसे भिन्न जो भी पदार्थ होगा वह नाशवान् ही होगा, क्योंकि