त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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एवं तेषां व्यवहृतौ समा सर्वत्र संस्थितिः ॥ १०८ ॥
मेधाविनां ज्ञानिनां तु वासनानाशहेतवे ।
विरुद्धवासनाभ्यासनिरोधादेरभावतः ॥ १०९॥
अनुवृत्तिर्भवेत् पूर्ववासनाऽनाशहेतुतः ।
अतः केचित् कर्मनिष्ठाः कामिनः क्रोधिनोऽपरे ॥ ११० ॥
उत्तमज्ञानिनो भान्ति विविधाचारतत्पराः ।
समनस्कस्तत्र यो वै मन्दज्ञानी निरूपितः ॥ १११ ॥
तेनापि वेद्यमखिलमसत्यत्वेन निश्चितम् ।
स्वरूपवित्तो नो किञ्चिद्भासते हि समाधिषु ॥ ११२ ॥
समाधिर्वै स्वरूपस्य विमर्शो नान्य उच्यते ।
निर्विकल्पस्वरूपं तु सर्वाश्रयतया सदा ॥ ११३ ॥
स्फुरत्येव हि सर्वेषां तदस्फूर्त्तौ न किञ्चन ।
हर्ष-शोक होते हैं, अन्तःकरणसे नहीं, उसी प्रकार तरह-तरहका व्यवहार
करते समय भी उनकी स्थिति सर्वत्र समान होती है ॥ १०८ ॥
ये बुद्धिमान् ज्ञानी अपनी वासनाओंके नाशके लिये विरुद्ध वास-
नाओंका अभ्यास अथवा मनोनिरोध आदि नहीं करते । अतः पूर्व-
वासनाओंका नाश न होनेके कारण कभी-कभी उनमेंसे किसीकी
अनुवृत्ति हो जाती है । इसीसे इन उत्तम ज्ञानियोंमेंसे कोई कर्मनिष्ठ,
कोई कामी और कोई क्रोधी इस प्रकार तरह-तरहके आचरणवाले देखे
जाते हैं ॥ १०६-१११ पू० ॥
ऊपर जिस समनस्क मन्द ज्ञानीका वर्णन किया उसने भी
सम्पूर्ण दृश्यका असत्यत्व तो निश्चय कर लिया होता है तथा
स्वरूपानुसन्धान और समाधिके समय उसे अन्य कुछ भासता
भी नहीं है, [किन्तु अन्य अवस्थाओंमें उसे हर्ष-विषादादि हो
जाते हैं ] ॥ १११ उ०-११२ ॥
वास्तवमें तो स्वरूपका अनुसन्धान ही समाधि कहा जाता है,
और कुछ नहीं । एक निर्विकल्पस्वरूप आत्मा ही सर्वदा सबके
आश्रयरूपसे स्फुरित हो रहा है । वह स्फुरित न हो तो कुछ भी