त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशोऽध्यायः । ३०३
तेषां मनो बहुविधं भूत्वा तत्तत्क्रमानुगम् ।
यथाकार्यं बहुविधं साधयेत्तद्गदेव हि ॥ १०२ ॥
उत्तमज्ञानिनामात्मदृष्टिर्वाह्यगतापि च ।
अविरुद्धा सर्वदा स्याद्येषां ते बहुमानसाः ॥ १०३ ॥
तत्प्रारब्धं मनोभूमौ भवेदङ्कुरितं पृथक् ।
भवेज्ज्ञानाग्निना दग्धं क्षतं भूतं पुनः पुनः ॥ १०४ ॥
प्रारब्धबीजाङ्कुरः स्यात् सुखदुःखसमागमः ।
तद्विमर्शः फलं प्रोक्तं कुतो दग्धाङ्कुरे फलम् ॥ १०५ ॥
आहृतेरनुसन्धानैस्तेषां व्यवहृतिर्भवेत् ।
यथा प्रौढो हि बालेन सह खेलन् हि दृश्यते ॥ १०६ ॥
हृष्टो विषण्णश्च शिलागजादीनां विनाशने ।
एवं हृष्यन्ति सीदन्ति कार्येषु बहुमानसाः ॥ १०७ ॥
यथाऽन्यकार्यसक्तस्य हर्षोद्वेगौ न चान्तरौ ।
इन सबका मन जैसे अनेकरूप होकर अनेक प्रकारके कार्योंको
उन-उनके क्रमानुसार सम्पन्न करता है, वैसे ही जिन उत्तम ज्ञानियों-
की आत्मदृष्टिमें बाहर जानेपर भी कभी कोई अन्तर नहीं पड़ता वे
'बहुमानस' कहलाते हैं ॥ १०२-१०३ ॥
उनका अलग-अलग प्रारब्ध जैसे-जैसे उनकी मनोभूमिमें अंकुरित
होता है वैसे-वैसे ही वह पुनः पुनः ज्ञानाग्निसे दग्ध हो जाता है ॥१०४॥
प्रारब्धरूप बीजका अंकुर है सुख-दुःखकी प्राप्ति और उसका फल
है सुख-दुःखपर विचार करना। किन्तु जब अंकुर ही जल गया तो फल
कहाँ से होगा ? ॥ १०५ ॥
केवल स्वभावसिद्ध अनुसन्धानके द्वारा ही उनका व्यवहार चलता
है। जैसे कोई-कोई प्रौढ पुरुष बच्चोंके साथ खेलते समय पत्थर-
के हाथी आदि किसी खिलौनेके फूट जानेपर प्रसन्न या उदास होता
देखा जाता है उसी प्रकार ये बहुमानस ज्ञानी भी व्यवहारमें हर्षित
और दुःखित होते देखे जाते हैं ॥ १०६-१०७॥
जिस प्रकार किसी अन्य कार्यमें लगे हुए पुरुषको ऊपर हीसे