त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशोऽध्यायः। २६३
व्यर्था सापि भवेन्मन्दा मुमुक्षा राम सर्वथा ।
यथा फलश्रुतेरिच्छा सामान्या न फलावहा ॥ ३८ ॥
फलश्रुत्युत्तरोद्भूता नेच्छा कर्मफलावहा ।
फलश्रुत्या कस्य नाम न स्यात् सा जीवधर्मिणः ॥ ३९ ॥
तस्मादापातरूपाया मुमुक्षाया न वै फलम् ।
यथा मुमुक्षा तीव्रा स्यात्तथा तस्याचिरं फलम् ॥ ४० ॥
मुमुक्षा या मुख्यतमा सा साधनगणेष्वलम् ।
प्रवृत्तिमुत्पादयेद्वै सा हि तत्परतोच्यते ॥ ४१ ॥
यथा सुदग्धसर्वाङ्गो न शीतान्यदपेक्षते ।
तथा यदा विमुक्त्यन्यन्नापेक्षेत हि सर्वथा ॥ ४२ ॥
सा मुमुक्षा भवेत्तीव्रा समर्था फलसाधने ।
एषा विमुक्तेरन्यत्र दोषदृष्ट्यैव जायते ॥ ४३ ॥
परशुराम ! वह मुमुक्षुता भी यदि मन्द हो तो सर्वथा व्यर्थ ही
होती है, जिस प्रकार केवल फल सुनकर होनेवाली इच्छा सामान्य
ही होती है, उससे फलकी प्राप्ति नहीं होती ॥ ३८ ॥
फल सुननेके पश्चात् उत्पन्न हुई इच्छा कर्मका फल देनेवाली
नहीं होती। ऐसा कौन जीवधर्मी है जिसे फल सुनकर इच्छा उत्पन्न
न हो ॥ ३६ ॥
इसलिये जो अकस्मात् (किसी कारणविशेषसे) उत्पन्न हो
जाती है उस मुमुक्षुता का फल नहीं होता। मुमुक्षा जितनी तीव्र होगी
उतना ही शीघ्र उसका फल प्राप्त होगा ॥ ४० ॥
जो तीव्रतम मुमुक्षा है वह तो अकेली ही सम्पूर्ण साधनोंमें प्रवृत्ति
उत्पन्न कर देती है। उसीको तत्परता भी कहते हैं ॥ ४१ ॥
जिसके सब अंगोंमें अत्यन्त दाह हो रहा हो वह पुरुष जैसे
शीतके सिवा किसी अन्य वस्तुकी इच्छा नहीं करता, उसी प्रकार जब
मुक्तिके सिवा और किसी प्रकारकी इच्छा न रहे तब वह तीव्र मुमुक्षा
होती है वही मुक्तिरूप फल प्राप्त करानेमें समर्थ है। ऐसी मुमुक्षा मुक्तिके
सिवा और सभीमें दोषदृष्टि होनेपर ही उत्पन्न होती है ॥ ४२-४३ ॥