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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 288

२७४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
गुरूपदिष्टं यत् किञ्चित् सद्वाप्यसदपीतरत् ।
अनुदाहृत्य चात्मानं यावन्न ह्यवलोकयेत् ॥ ८९ ॥
तावन्न फलमाप्नोति परोक्षात्मतया श्रुतेः ।
अतो मयोक्तं राम त्वं सम्पश्यात्मनि सद्द्दशा ॥ ९० ॥
चितिर्या परमा देवी सर्वसामान्यरूपिणी ।
सा प्रकाशमयी यस्माज्जडव्यावृत्तरूपिणी ॥ ९१ ॥
अतः स्वात्मनि विश्रान्तिस्त्वहन्ता पररूपिणी ।
जडाश्चिदात्मविश्रान्ताश्चिदात्मनि विभासतः ॥ ९२ ॥
न स्वरूपे स्वतो भान्ति तस्मान्न स्वात्मविश्रमः ।
चितेस्तु केवलं स्वस्मिन्ननन्यापेक्षया सदा ॥ ९३ ॥
भासमानत्वतः स्वस्मिन् विश्रान्तिरूपपद्यते ।
पूर्णाहन्ता परा सेयं या जडेषु न विद्यते ॥ ९४ ॥
गुरुदेवने सत् , असत् अथवा किसी अन्यरूपसे जो कुछ बतलाया
है उसे जबतक आत्मानुसंधान करते हुए नहीं देखा जायगा तबतक
केवल परोक्षरूपसे सुन लेनेसे ही मोक्ष रूप फलकी प्राप्ति नहीं होगी ।
इसलिये परशुराम ! मैंने जो कुछ कहा है उसे तुम अन्तर्मुखी दृष्टिसे
अच्छीतरह अनुभव करो ॥ ८९-६० ॥
सम्पूर्ण पदार्थोंके विशेष अंशोंको त्यागकर उनमें सामान्यरूपसे
भासनेवाली परमा देवी जो चिति है वही प्रकाशस्वरूपा है क्योंकि
उसके स्वरूपमें जडताका सर्वथा निषेध है ॥ ६१ ॥
अतः वह स्वस्वरूपमें विश्रान्तिस्वरूपा है तथा पराहन्तारूपिणी है ।
जड पदार्थ उस चित्स्वरूपमें ही विश्रान्त हैं, चिदात्माके आश्रयसे
ही उनका भान होता है ॥ ६२ ॥
वे अपने स्वरूपमें स्वयं प्रकाशित नहीं होते, इसलिये उनकी
अपनेमें ही विश्रान्ति ( स्थिति ) नहीं है । केवल शुद्ध चितिकी ही
अपनेमें विश्रान्ति होनी सम्भव है, क्योंकि वह किसी अन्यकी अपेक्षा
न करके सर्वदा अपने स्वरूपमें ही प्रकाशमान है । यही श्रेष्ठ पूर्णा-
हन्ता है, जो कि जड पदार्थोंमें नहीं है ॥ ६३-६४ ॥